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पाकुड़ : सखी मंडल से जुड़कर आदिवासी महिला बनी आत्मनिर्भर, बत्तख पालन से कमाए 2 लाख रुपये

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नंदलाल तुरी
पाकुड़ जिले के हिरणपुर प्रखंड अंतर्गत बेलडीहा गांव की आदिवासी महिला दुलारस किस्कू ने सखी मंडल से जुड़कर मेहनत, लगन और दृढ़ संकल्प के बल पर आत्मनिर्भरता की एक प्रेरक मिसाल पेश की है। पारंपरिक कृषि पर निर्भर अपने परिवार की सीमित आय को उन्होंने बत्तख पालन व्यवसाय के माध्यम से सशक्त आजीविका में बदल दिया है। दुलारस किस्कू ने नवंबर माह में बतख के चूजों का पालन शुरू किया और नववर्ष 2026 के अवसर पर 400 बतखों को 500 रुपये प्रति बतख की दर से बेचकर कुल 2 लाख रुपये की आय अर्जित की। उनकी यह उपलब्धि न केवल उनके परिवार, बल्कि पूरे क्षेत्र की महिलाओं के लिए प्रेरणास्रोत बन गई है।
दुलारस किस्कू की सफलता संघर्ष और निरंतर प्रयास की कहानी है। उन्होंने ग्रामीण विकास विभाग अंतर्गत पालश झारखंड स्टेट लाइवलीहुड प्रमोशन सोसाइटी (जेएसएलपीएस) द्वारा संचालित मसीह सखी मंडल से जुड़कर ऋण के माध्यम से व्यवसाय की शुरुआत की। प्रारंभ में उन्होंने 50 बत्तख, 50 मुर्गी एवं 2 बकरियों का पालन शुरू किया। शुरुआती दौर में विपणन और संसाधनों से जुड़ी कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। पहली खेप की बिक्री के बाद दुलारस किस्कू ने सखी मंडल से पुनः 20 हजार रुपये का ऋण लेकर 500 बतखों का पालन शुरू किया। शुरुआत में अस्थायी संरचना में व्यवसाय संचालित किया गया, लेकिन आमदनी बढ़ने पर उन्होंने स्थायी तालाब का निर्माण कराया। इस पूरे सफर में उनके पति मनु बेसरा का उन्हें भरपूर सहयोग मिला, जिससे व्यवसाय को निरंतर मजबूती मिली।
वर्तमान में दुलारस किस्कू 500 बत्तख, 400 मुर्गियों एवं देशी मुर्गियों का सफलतापूर्वक पालन कर रही हैं। दिसंबर माह में मुर्गियों की बिक्री से उन्होंने 80 हजार रुपये की अतिरिक्त आय भी अर्जित की। बतख पालन से प्राप्त आय का उपयोग वे अपने जीवन स्तर को बेहतर बनाने में कर रही हैं। उन्होंने पक्के मकान के निर्माण की दिशा में कदम बढ़ाया है और अपने बच्चों को अच्छे विद्यालय में शिक्षा दिला रही हैं। इसके साथ ही वे सखी मंडल के माध्यम से मछली पालन भी कर रही हैं, जिससे उनके आय के अतिरिक्त स्रोत विकसित हो रहे हैं। दुलारस किस्कू ने बताया कि इस सफलता में उन्हें अपने पति के साथ-साथ जेएसएलपीएस और प्रशासन का निरंतर मार्गदर्शन एवं सहयोग मिला। दुलारस किस्कू की यह सफलता उन ग्रामीण और आदिवासी महिलाओं के लिए प्रेरणा है, जो स्वरोजगार के माध्यम से आत्मनिर्भर बनना चाहती हैं। उन्होंने यह सिद्ध कर दिया है कि सही मार्गदर्शन, सखी मंडल का सहयोग और कठिन परिश्रम के बल पर महिलाएं आर्थिक रूप से सशक्त बन सकती हैं।

 

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