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ग्राम सभा से हटाए जाएंगे धर्मांतरित आदिवासी, निशा उरांव ने खूंटी से शुरू किया डीलिस्टिंग उलगुलान!

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द फॉलोअप डेस्क
आईआरएस अधिकारी निशा उरांव के नेतृत्व में आज खूंटी से धर्मांतरित आदिवासियों को ग्राम सभा के पदों से हटाने का उलगुलान प्रारंभ किया गया। आदिवासी पारंपरिक बहुस्तरीय व्यवस्था, खूंटी के बैनर तले उन्होंने आदिवासी समाज के पारंपरिक ग्राम प्रधानों के साथ जिले की उपायुक्त आर रॉनिटा को इस संबंध में ज्ञापन भी सौंपा। ज्ञापन सौंपने के बाद निशा उरांव ने कहा कि यह समाज के लोगों का पारंपरिक उलगुलान है। यह ग्राम सभा के पदाधिकारी पद पर बैठे धर्मांतरित आदिवासियों को हटाने का उलगुलान है।

निशा उरांव ने कहा कि पेसा क्षेत्र के आदिवासियों को संवैधानिक रूप से विशेष अधिकार प्राप्त है। इसके तहत पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ साथ रुढिजन्य धार्मिक प्रथा को महत्व दिया गया है, लेकिन ग्राम सभा के पदों पर धर्मांतरित आदिवासी भी आसीन हो गए हैं। ये अपना सामाजिक जिम्मेदारी तो निभा सकते हैं, लेकिन वह धार्मिक जिम्मेदारी कभी निभा नहीं सकते। इसलिए धर्मांतरित आदिवासियों को ग्राम सभा के पदों से हटाया जाए। उनके इस अभियान को सामाजिक डिलिस्टिंग के उलगुलान का भी नाम दिया गया है।

बिरसा की धरती से शुरू हुआ डीलिस्टिंग उलगुलान

निशा उरांव ने कहा कि आज बिरसा भगवान के जन्मस्थल से ही उनके अनुयायियों द्वारा परंपरा और धर्म के संरक्षण के लिए सामाजिक आंदोलन शुरू किया गया है। यह उलगुलान तीर धनुष से नहीं बल्कि क़ानून की मदद से किया जाएगा। उन्होंने राज्य के अन्य जिलों में सामाजिक डिलिस्टिंग का यह उलगुलान प्रारंभ करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि इसी आंदोलन के माध्यम से आदिवासियों की रीति-रिवाज, संस्कृति और रुढिजन्य परंपरा संरक्षित हो सकेगी। PESA Act और संविधान (अनुच्छेद 25, 26, 29) में रूढ़िजन्य विधि , धार्मिक एवं सामाजिक प्रथा के संरक्षण का वचन है। 

निशा उरांव ने कहा कि धर्मांतरित आदिवासी पारंपरिक आदिवासी संरचना में पदाधिकारी नहीं बन सकते हैं क्योंकि इन पदों में धार्मिक एवं सामाजिक ज़िम्मेदियाँ जुड़ी रहती है। धर्मांतरित आदिवासी सामाजिक ज़िम्मेदारी तो निभा लेगा, लेकिन धार्मिक ज़िम्मेदारी नहीं निभा पाएगा। आज राज्य के कई ग्राम सभा / बहुस्तरीय पारंपरिक व्यवस्था में ईसाई ग्राम प्रधान, पाहन, पड़हा राजा इत्यादि पदस्थापित हैं। इससे समाज के पारंपरिक विरासत को बहुत क्षति पहुंच रही है। इस “पारंपरिक उलगुलान” को “सामाजिक डीलिस्टिंग” भी कहा जा सकता है।

गैर-पारंपरिक जिउड़ी ग्राम सभा अर्थात् “मॉडल ग्राम सभा” तथा “संयुक्त पड़हा” जैसी संरचनाओं को समाज द्वारा ख़ारिज किया गया। इन संरचनाओं को धर्मांतरित आदिवासी द्वारा बनाया गया है। यह एक प्रकार का सांस्कृतिक घुसपैठ है। यह CULTURAL HEGEMONY है। यह आदिवासी समाज के मूल पहचान पर कब्जा करने की षड्यंत्र है। उदाहरण के रूप में आज पाहन ( पुजारी ) के पद पर भी धर्मांतरित आदिवासी कब्जा किए हुए हैं, जबकि इस पद का केवल धार्मिक जिम्मेदारी है। इसी पद से जुड़े भुईहरी/पहनाई जैसी धार्मिक भूमि (भुईंहारी, खूंटकट्टी ज़मीन) पर इनके द्वारा कब्ज़ा बना कर रखा गया है। इस ज़मीन को प्रशासन द्वारा ग्राम सभा के नियंत्रण में वापस लाने में सहयोग की माँग भी की गयी।


11 प्रमुख मांगें

1-पाँचवी अनुसूची क्षेत्र के की पारंपरिक ग्राम सभाओं को प्रथागत कानून, संवैधनिक प्रावधान एवं PESA Act के अनुरूप संरक्षित किया जाए और इन्हें सामान्य क्षेत्र के ग्राम सभा की तरह ना देखा जाये।
2- ग्राम सभा गठन हेतु, ज़िला उपायुक्त द्वारा "गठित टीम" में पारंपरिक आदिवासी पदाधिकारी को अनिवार्य रूप से सदस्य के रूप में रखा जाये।
3- सभी पारंपरिक पदों को रूढ़ियों के अनुसार मूल आदिवासी धर्म का पालन करने वाले आदिवासी के लिए संरक्षित की जाये
4- कोष संचालन के लिए ३ सदस्यों हेतु ग्राम सभा का निर्णय स्वीकार किया जाये
5- पूर्व से स्थापित सभी गैर पारंपरिक पदों को ख़ारिज किया जाये
6- जिउड़ी ग्राम सभा जैसे सभी गैर-पारंपरिक ग्राम सभा को मान्यता नहीं दी जाए
7- हर नये ग्राम सभा के दावों में पारंपरिक ग्राम प्रधान / हातु मुंडा, महतो, पाइनभरा, पाहन, इत्यादि का अनिवार्य रूप से उल्लेख हो और केवल इन्हें मान्यता दी जाए।
8- "संयुक्त पड़हा" को मान्यता न दी जाए।
9- भुईहरी / पहनाई भूमि का दुरुपयोग को रोका जाये, और ग्राम सभा के निर्णय के अनुसार पहनाई ज़मीन को ग्राम को वापिस कराया जाये।
10- पारंपरिक पूजा-अर्चना में बाधा उत्पन्न करने वालों के विरुद्ध कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।
11- जिला प्रशासन को आदिवासी धार्मिक एवं सांस्कृतिक अधिकारों की रक्षा हेतु निर्देशित किया जाए।

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