द फॉलोअप डेस्क
जमशेदपुर और आदित्यपुर दौरे के क्रम में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने एक बार फिर यह सिद्ध कर दिया कि पद की गरिमा के साथ सादगी और मानवीय संवेदना जब साथ चलें, तो लोकतंत्र और भी जीवंत हो उठता है। दरअसल, सोमवार को सरायकेला-खरसावां जिले के एनआईटी, आदित्यपुर में आयोजित 15वें दीक्षांत समारोह में शामिल होकर जब राष्ट्रपति जमशेदपुर लौट रही थीं, तभी आदित्यपुर के आकाशवाणी चौक के समीप सड़क के दोनों ओर लोगों की उमड़ी भीड़ ने उनका ध्यान खींच लिया। हाथों में उत्साह, चेहरों पर अपनापन और कंठों से गूंजते भारत माता की जय और वंदे मातरम् के नारों ने राष्ट्रपति के काफिले को जैसे थाम लिया। इस दौरान औपचारिकताओं से ऊपर उठते हुए राष्ट्रपति ने अपने काफिले को रुकवाया और फिर वह दृश्य सामने आया, जिसने पल भर में इस यात्रा को इतिहास का मानवीय क्षण बना दिया।
राष्ट्रपति स्वयं अपने वाहन से उतरीं, सुरक्षा घेरे के बीच लोगों के बीच पहुंचीं और स्नेह से भरे हाथों के इशारों के साथ उनका अभिनंदन स्वीकार किया। ऐसे में चारों ओर भारत माता की जय और वंदे मातरम् के उद्घोष गूंजते रहे। इस दौरान कुछ दूर तक वे सड़क पर पैदल चलीं, न किसी जल्दबाजी में, न किसी दूरी के भाव में। केवल मुस्कान, हाथों की लहर और आंखों में वही अपनापन, जो किसी अपने के आने पर होता है। बैरिकेडिंग के दोनों ओर खड़ी भीड़ उस क्षण को जैसे शब्दों में नहीं, बल्कि भावनाओं में जी रही थी। यह केवल प्रोटोकॉल टूटने भर की खबर नहीं थी, बल्कि लोकतंत्र की उस आत्मा का दृश्य था, जहां देश का सर्वोच्च पद जनता के बीच उतरकर यह कहता दिखा कि सत्ता नहीं, संवेदना सबसे बड़ा सम्मान है।
