द फॉलोअप डेस्क
कांवरिया पथ पूरे एक साल के बाद फिर एक बार केसरिया रंग से भर गया है। मौसम इस बार कांवरियों के लिए नटखेल खेल रही है, कभी धूप, कभी छांव, कभी बारिश, लेकिन भक्ति रंग में सराबोर कांवरियों का जत्था बेहद उत्साह के साथ कांवरिया पथ पर झूमते और नाचते हुए नजर आ रहे हैं। कांवर यात्रा के दौरान गोडियारी नदी का इंतजार सभी कांवरियों को रहता है। शिव भक्तों में एक अलग उत्साह रहता है। गोडियारी नदी एक मनोरंजन स्थल से कम नहीं दिखती। यहां शिवलिंग और घोड़े के साथ फोटो खिंचवाने का अलग ही आनंद होता है। समय के साथ इस नदी की सूरत जरूर बदल गई, लेकिन आज भी कांवरिये यहां रुककर अपनी थकान मिटाना नहीं भूलते।
सुल्तानगंज से उत्तरवाहिनी गंगा का जल भरकर कांवरिया 100 किलोमीटर से अधिक की दूरी तय करके बाबाधाम देवघर तक पहुंचते हैं। यह लंबी यात्रा कोई कांवरिया एक या दो दिन में तो कोई इससे अधिक समय में तय करता है। वहीं करीब 85 किलोमीटर की दूरी तय करने के बाद वह गोडियारी नदी पहुंचकर कांवरिये अपनी थकान मिटाना नहीं भूलते।
पहले की गोडियारी नदी
एक दौर था जब गोडियारी नदी पर पुल नहीं बना था। कांवरियों को पानी में उतरकर नदी पार करके ही जाना पड़ता था। 80 से 85 किलोमीटर की दूरी तय करके जब कांवरिया यहां पहुंचते थे तो नदी किनारे पानी के अंदर बैठकर गोडियारी में भुट्टा खाने का मजा अलग ही रहता था। आस-पास के गांव के लोग यहां भुट्टा पकाते और कांवरिया इन्हीं भुट्टों का स्वाद लेते। ग्रामीणों को दो रूपया कमाने का भी इससे मौका मिलता था। यहां कई फोटोग्राफर भी घूमते मिलते थे, जिससे फोटो खिंचवाने की होड़ रहती थी।
गोडियारी की सूरत
समय के साथ गोडियारी नदी की अब सूरत बदल गई है। नदी पर दूसरी ओर पुल जरूर बना दिया गया, लेकिन आज भी कांवरिये इस पुल से नहीं जाते बल्कि नदी के रास्ते ही जाना पसंद करते हैं। रेत पर ही दुकानें सजी हैं। कांवरिये इसमें खाने-पीने के लिए रुकते हैं और फोटोशूट भी कराते हैं। एक तरह से गोडियारी नदी होकर गुजरते कांवरिये यहां के स्थानीय लोगों की उम्मीदें भी हैं।
गोडियारी नदी से बाबाधाम
बता दें कि गोडियारी नदी के इस पार यानी पहले इनारावरण पड़ाव के रूप में आता है। जबकि गोडियारी नदी पार करने के तीन किलोमीटर बाद पटनिया आता है। बाबाधाम की दूरी यहां से करीब 14 से 15 किलोमीटर बचती है। कांवरिये काफ़ी उत्साह के साथ जयकारा लगाते हुए बाबाधाम पहुंच जाते हैं।
