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झारखंड : बजट में पूर्व से सरकार की पीठ पर पड़ी जिम्मेदारियों को ढोने की दिखती है मजबूरी

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जीतेंद्र कुमार
हेमंत सोरेन सरकार के दूसरे कार्यकाल में वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने लगातार दूसरी बार झारखंड का वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए एक लाख 58 हजार 560 करोड़ का आम बजट पेश किया। यह परंपरा के अनुरूप पिछली बार की तुलना में लगभग 9.2 फीसदी अधिक है। केंद्र और राज्य सरकारें, कोशिश करती है कि बजट राशि में लगभग 10 फीसदी की वृद्धि हो। इस बजट में भी  किया गया है। पूर्व की तरह इस बार भी अबुआ दिशोम बजट नाम दिया गया है। 2022-23 में हमर अपन बजट, 2023-24 एवं 2024-25 में हमीन कर बजट और 2025-26 में अबुआ बजट नाम दिया गया था। पूर्व में जेंडर बजट तो इस बार भी मूल बजट में बाल बजट घुसाया गया है। नाम बदलने की परंपरा कायम रखी गयी है। लेकिन बजट में किसी ऐसे बदलाव का संकेत नहीं है, जिससे झारखंड की किश्मत में अप्रत्याशित बदलाव की संभावना दिखती हो। इसके विपरीत बजट में सरकार के पीठ पर पड़े पूर्व की जिम्मेदारियों को ढोने का स्पष्ट और साफ साफ संकेत दिखता है। किसी ऐसे आधारभूत संरचना निर्माण पर जोर नहीं दिया गया है, जिससे झारखंड और झारखंडियों की आर्थिक स्थिति में बदलाव आ सकेगा। पर्यटन पर अवश्य जोर दिया गया है, लेकिन इसके लिए सबसे अधिक जरूरी विधि व्यवस्था में सुधार का विषय चलताऊ ढंग से बता दिया गया है। यह जरूर है कि वित्त मंत्री ने दावा किया है कि इस बजट से ग्रामीण अर्थ व्यवस्था मजबूत होगी, रोजगार सृजन को बल मिलेगा।


केंद्र से प्यार भी, तकरार भी, बजट में अस्पष्टता
झारखंड सरकार के इस बजट में स्पष्टता का अभाव और द्वंद साफ साफ झलकता है। वित्त मंत्री ने अपने भाषण में कहा-झारखंड के सर्वांगीण विकास के लिए बहुत कुछ करना अकेले राज्य सरकार के बस की बात नहीं है। केंद्र का आर्थिक सहयोग जरूरी है। लेकिन केंद्रीय करों में झारखंड की हिस्सेदारी के लिए निर्धारित लक्ष्य से लगभग पांच हजार करोड़ की राशि अभी तक अप्राप्त है। अनुदान की राशि में भी केंद्र से अब तक 11 हजार करोड़ की राशि कम मिली है। अनुदान की राशि में भी केंद्र लगातार कटौती कर रही है। मनरेगा जो अब वीबी-जी, राम जी योजना का नया स्वरूप तय किया है, उसमें राज्य को 40 फीसदी राशि का मैचिंग ग्रांट देना पड़ेगा। इससे राज्य सरकार के कोष पर प्रति वर्ष लगभग 5640 करोड़ का बोझ पड़ेगा। लेकिन दूसरी ओर बजट भाषण में वित्त मंत्री यह भी संदेश दे रहे हैं-किसी के पैर में गिर कर कामयाबी पाने से बेहतर है, अपने पैरों पर चल कर कुछ बनने की ठान लें। स्पष्ट संदेश दे रहे हैं कि झारखंड अपने पैरों पर चलने की ताकत रखता है। पर इसके लिए संसाधन कहां से जुटाए जाएंगे, यह क्लियर नहीं है। कौन से सेक्टर या प्रयास होगा, जिससे राजस्व में वृद्धि होगी, यह नहीं है। वही घिसी-पिटी बातें हैं, जिससे राजस्व में अप्रत्याशित की संभावना कहीं से नहीं दिखायी पड़ रही है। और जब संसाधन नहीं बढ़ेंगे तो झारखंड को विकसित राज्यों की श्रेणी में खड़ा करना केवल राजनीतिक भाषा तक सीमित होती जाएगी।

डॉ भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय
हां वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने इस बजट में अपने समाज का जरूर ख्याल रखा है। दलितों के मसीहा कहे जानेवाले डॉ भीमराव अंबेडकर के नाम पर चतरा में विश्वविद्यालय की स्थापना की घोषणा, निश्चित रूप से उनके समाज और दलित बहुल चतरा के इलाके में सकारात्मक संदेश दिया है। आने वाले वर्षों में इसके लिए वित्त मंत्री को उनके समाज के लोग जरूर याद करते रहेंगे।

स्थापना व्यय को कम करने पर जोर, लेकिन लेकिन कैसे होगा संभव
बजट में स्थापना व्यय को लगातार कम करने पर जोर दिया गया है। आंकड़े के अनुसार 2019-20 में कुल बजट का 47 फीसदी स्थापना मद में रखा गया था। इस वित्तीय वर्ष में स्थापना व्यय को 36 फीसदी तक कम किया गया है। लेकिन यह नहीं बताया गया है कि राज्य में रिक्त पड़े लाखों पदों पर नियुक्तियां होंगी तो स्थापना व्यय को सीमित रखना, कैसे संभव होगा। मालूम हो कि स्थापना व्यय में वेतन, रख रखाव और अन्य अनुपादक खर्च आते हैं। यह राज्य सरकार के लिए दोधारी तलवार है।

जीएसडीपी वृद्धि कैसे होगा संभव
राज्य का जीएसडीपी वित्तीय वर्ष 2024-25 में 5 लाख 16 हजार करोड़ रहा। अगले पांच वर्षों में इसे बढ़ा कर 10 लाख करोड़ किए जाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। इसके लिए वर्तमान मूल्य पर करीब 14 फीसदी के दर से विकास करना होगा। जबकि 2011-12 से 2024-25 के बीच मौजूदा कीमतों पर जीएसडीपी में 9.9 फीसदी की औसत दर से वृद्धि हुई है। अगले पांच वर्षों में अतिरिक्त पांच फीसदी का वृद्धि दर प्राप्त कैसे होगा, यह बजट में रेखांकित नहीं है।

रोजगार, निवेश और औद्योगिक विकास में वृद्धि पर कोई फोकस नहीं
बजट में रोजगार कैसे बढ़े, पूंजी निवेश में इसके लिए कैसे बढोत्तरी हो या औद्योगिक विकास को बल मिले, इसके लिए कोई नयी योजना या कार्यक्रम नहीं दिखता है। केवल दावोस में मिले प्रस्ताव का जिक्र करने भर से पूंजी निवेश औरऔद्योगिक विकास शायद संभव नहीं होगा। क्योंकि दावोस पूर्व भी कई मौके पर इस तरह के प्रस्ताव झारखंड को मिल चुके हैं। इसके विपरीत पुरानी चालू योजनाओं, मसलन सर्वजन पेंशन योजना, मुख्यमंत्री मंईयां सम्मान योजना, मुख्यमंत्री रोजगार सृजन योजना, कृषि ऋण माफी योजना, मुख्यमंत्री सुखाड़ राहत योजना, मुख्यमंत्री पशुधन योजना, मरांड गमके जयपाल सिंह मुंडा पारदेशीय छात्रवृत्ति योजना, खाद्य सुरक्षा योजना, सावित्री बाई फूले किशोरी समृद्धि योजना, जैसी योजनाओं के आगे भी जारी रखने की बात बार बार दुहरायी गयी है। यह सच भी है कि मुख्यमंत्री मंईयां सम्मान योजना, किशोरी समृद्धि जैसी कई योजनाओं से समाज के नीचले पायदान पर बैठे लोगों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति में उतरोत्तर सुधार हो रहा है। लेकिन इसके साथ साथ झारखंड को विकसित राज्यों की श्रेणी में खड़ा करने के लिए यह काफी नहीं है। इसके लिए राज्य में पूंजी निवेश का माहौल, जल जंगल और जमीन जैसे विवादित विषयों से जुड़ी समस्याओं के ठोस समाधान की दिशा में भी पैरलल प्रयास करना होगा। लेकिन इस बजट में यह नादारथ है।


व्यवस्थागत सुधार, भ्रष्टाचार पर अंकुश और जिम्मेदार प्रशासन का जिक्र ही नहीं
पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने कहा था कि केंद्र से दी जानेवाले एक रुपए में लाभुक तक मात्र 15 पैसे ही पहुंचते हैं। राजीव गांधी का यह बयान आज भी प्रासंगिक है। लाभुकों के खाते में अब सीधे राशि भेजे जाने से इसमें थोड़ी कमी जरूर आयी है। लेकिन भ्रष्टाचार में कोई बहुत अधिक कमी नहीं आयी है। व्यवस्थागत सुधार, मानव संसाधन का बेहतर उपयोग, जिम्मेदार प्रशासन की जरूरत हर योजना और मोर्चे पर आवश्यक दिखता है। लेकिन राज्य सरकार की किसी योजना के गुणवत्ता पूर्ण ढंग से ससमय पूरा करने के लिए जरूरी इस क्षेत्र पर बजट में कोई जिक्र ही नहीं है।

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