द फॉलोअप डेस्क, रांची:
Jharkhand Police: आजसू प्रमुख सुदेश महतो (Sudesh Mahto) ने आदिवासी नेत्री निशा कुमारी भगत (Nisha Kumari Bhagat) की आत्महत्या की घटना को हृदयविदारक बताते हुए गहरी संवेदना व्यक्त की है। घटना की निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच की मांग करते हुए सुदेश महतो ने प्रदेश की हेमंत सोरेन (Hemant Soren) सरकार को कठघरे में खड़ा किया है। सुदेश महतो ने कहा कि निशा भगत की मौत से जुड़े प्रत्येक सवाल का जवाब मिलना चाहिए, तभी न्याय सुनिश्चित होगा। सुदेश महतो ने दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की। आजसू प्रमुख ने कहा कि निशा भगत की मौत पूरे झारखंड की अंतर्रात्मा को झकझोरने वाला है।

किन परिस्थितियों में निशा भगत ने जान दी
सुदेश महतो ने कहा कि निशा कुमारी भगत ने सुसाइड से पहले जिस प्रकार लाइव आकर हेमंत सरकार और प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाए। थाना प्रभारी को लाइव वीडियो के बीच में फोन कॉल किया और अपनी जान दी, वह पूरे प्रदेश को झकझोरने वाली घटना है। सुदेश महतो ने कहा कि यह जांच का विषय है कि आखिर किन परिस्थितियों में एक आदिवासी बेटी को न्याय और अपनी बात रखने के लिए इस हद तक जाना पड़ा। सुदेश महतो ने कहा कि इसे केवल आत्महत्या मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
सुदेश महतो ने कहा कि निशा कुमारी भगत को न्याय मिलना चाहिए। उनकी मौत से जुड़े प्रत्येक सवाल का जवाब मिलना चाहिए। दोषियों को किसी भी कीमत पर बख्शा नहीं जाना चाहिए।

निशा कुमारी भगत की मौत दुर्भाग्यपूर्ण घटना
आजसू पार्टी के केंद्रीय प्रवक्ता डॉ. देवशरण भगत ने भी निशा भगत की आत्महत्या को दुर्भाग्यपूर्ण घटना बताते हुए शोक व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि निशा भगत सुसाइड प्रकरण में सामने आए आरोपों की गंभीरता को देखते हुए पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। जांच में जिनकी भी भूमिका और जिम्मेदारी सामने आए, उनके विरुद्ध कठोर कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।

आदिवासी हक-अधिकारी की बात करना गुनाह नहीं
डॉ. भगत ने कहा कि निशा भगत जनजातीय समाज के अधिकारों, अस्मिता और जमीन की रक्षा के लिए मुखर होकर आवाज उठाती थीं। उनका इस तरह दुनिया से चले जाना बेहद पीड़ादायक और दुर्भाग्यपूर्ण है। यह घटना झारखंड की शासन-व्यवस्था, प्रशासनिक संवेदनशीलता और आदिवासी समाज को न्याय एवं सुरक्षा उपलब्ध कराने की व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करती है। उन्होंने कहा कि झारखंड में आदिवासियों की जमीन पर अवैध कब्जे, जमीन की हेराफेरी और उन्हें प्रताड़ित किए जाने की शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं।
राज्य के विभिन्न थाना और अंचल कार्यालयों में जमीन से जुड़े मामलों को लेकर आदिवासी परिवारों को न्याय के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। आखिर जल, जंगल, जमीन और आदिवासी अस्मिता की रक्षा के संकल्प से बने झारखंड में आदिवासी समाज अपनी ही जमीन पर असुरक्षित क्यों महसूस कर रहा है?
सरकार को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि भविष्य में किसी भी आदिवासी को अपनी जमीन, सम्मान और अधिकारों की रक्षा के लिए इस तरह की प्रताड़ना और असहायता का सामना न करना पड़े।