द फॉलोअप डेस्क
सरायकेला-खरसावां जिले के चांडिल वन क्षेत्र में एक जंगली हाथी की मौत ने वन विभाग की तैयारियों और वन्यजीव संरक्षण की जमीनी हकीकत को पूरी तरह उजागर करके रख दिया है। दरअसल, नीमडीह थाना क्षेत्र के चातरमा गांव की जंगल-तराई में दलदल में फंसा एक हाथी इलाज के इंतजामों के बीच दम तोड़ गया। घटना के बाद पूरे इलाके में शोक और नाराजगी का माहौल है।
बताया जा रहा है कि हाथी महीनों से बीमार था और अत्यधिक कमजोरी के कारण भटकते हुए खेत की कीचड़ में जा गिरा था। दलदल में फंसने के बाद वह घंटों तड़पता रहा। शनिवार सुबह ग्रामीणों ने जब हाथी की हालत देखी, तब जाकर वन विभाग को सूचना दी गई। इसके बाद विभागीय टीम मौके पर पहुंची, लेकिन तबतक हालात हाथ से निकल चुका था।.jpeg)
जेसीबी और अन्य संसाधनों के जरिए हाथी को बाहर निकालने की कोशिश जरूर हुई, पशु चिकित्सकों की टीम भी मौजूद रही, लेकिन सवाल यह है कि यदि हाथी चार महीने से बीमार था, तो उसकी निगरानी और सुरक्षित इलाज की व्यवस्था पहले क्यों नहीं की गई। .jpg)
ग्रामीणों का आरोप है कि समय पर प्रभावी इलाज और निगरानी होती, तो यह मौत टाली जा सकती थी। इधर, हाथी की मौत के बाद ग्रामीणों ने परंपरागत रूप से पूजा-अर्चना कर उसे अंतिम विदाई दी। वहीं, इस घटना ने वन विभाग के दावों और जमीनी सच्चाई के बीच के अंतर को उजागर कर दिया है। जंगल में बीमार वन्यजीवों की समय रहते पहचान और रेस्क्यू को लेकर अब गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
चांडिल वन क्षेत्र पदाधिकारी शशि प्रकाश रंजन ने बताया कि हाथी पिछले चार महीनों से बीमार था और उसका इलाज चल रहा था। हाथी के इस क्षेत्र तक पहुंचने के कारणों की जांच की जा रही है। फिलहाल पोस्टमार्टम के बाद अंतिम संस्कार की प्रक्रिया पूरी की जा रही है।