द फॉलोअप डेस्क, रांची
JPSC News Jharkhand: झारखंड में 11वीं से 13वीं JPSC की प्रतियोगी परीक्षा से चयनित 342 अधिकारी झारखंड High Court में हुई सुनवाई के दौरान राज्य सरकार द्वारा रखे गए तथ्यों और तर्कों से चिंतित हो उठे हैं। सरकारी सेवा में होने के कारण अपना नाम छुपाते हुए इन चयनित अधिकारियों ने अपनी चिंता और आशंका को अपने शब्दों में कुछ इस तरह बयां किया है। एक लंबे लेख में इन अधिकारियों ने कई सवाल भी खड़े किए हैं। उसे हम नीचे हु-ब-हू प्रकाशित कर रहे हैं।-
झारखंड में 11 वीं से 13 वीं जेपीएससी से चयनित 324 अधिकारियों की नियुक्ति रद्द करने का मामला विवादों में घिरता जा रहा है। राज्य सरकार ने हाईकोर्ट में परीक्षा में व्यापक गड़बड़ी का हवाला देकर अपने फैसले को सही ठहराया है। लेकिन सरकार के हलफनामे और गिरफ्तार आरोपियों के जमानत आदेशों की तुलना करने पर कई विरोधाभास सामने आए हैं। खास बात यह है कि जिन घटनाओं का जिक्र सरकार ने अपने जवाब में किया है, उनमें कई 14वीं JPSC और वन विभाग की दूसरी भर्ती परीक्षाओं से जुड़ी हैं। सरकार ने अपने हलफनामे में दावा किया है कि परीक्षा में सेटिंग के लिए 11 अभ्यर्थियों के मूल शैक्षणिक प्रमाणपत्र रखे गए थे। लेकिन आरोपियों के जमानत आदेशों में यह मामला 14वीं JPSC की प्रारंभिक परीक्षा से जुड़ा बताया गया है। संबंधित घटना जनवरी 2026 की है, जबकि 11 वीं से 13वीं JPSC का अंतिम परिणाम 25 जुलाई 2025 को घोषित हो चुका था। चयनित अभ्यर्थियों के दस्तावेजों का सत्यापन भी अगस्त 2025 में पूरा हो गया था। ऐसे में सवाल उठता है कि पहले ही पूरी हो चुकी चयन प्रक्रिया से दूसरी परीक्षा के अभ्यर्थियों के प्रमाणपत्रों का मामला कैसे जोड़ा जा सकता है?
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इतना ही नहीं, सरकार ने अपने जवाब में कई अभ्यर्थियों की गिरफ्तारी होने की बात भी कही है। हालांकि, उपलब्ध जमानत आदेशों के अनुसार गिरफ्तार बताए गए लाभार्थी 14वीं JPSC, वन क्षेत्र पदाधिकारी और दूसरी भतीं परीक्षाओं से जुड़े हैं। 11वीं से 13वीं JPSC के 342 चयनित अधिकारियों में किसी की भी इस परीक्षा में गड़बड़ी के लाभार्थी के रूप में गिरफ्तारी की नहीं हुई है। सरकार ने स्वयं स्वीकार किया है कि चयनित अभ्यर्थियों की कथित संलिप्तता की जांच अभी जारी है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जब दोषियों की पहचान और जांच पूरी नहीं हुई थी, तो सभी चयनित अधिकारियों की नियुक्ति एक साथ रद्द करने का आधार क्या था? परिणाम आने के बाद जारी कथित TDPL वर्क ऑर्डर पर संदेह इस पूरे मामले में एक और नया विवाद पैदा किया है। हाईकोर्ट में हस्तक्षेपकर्ताओं की ओर से सरकारी कंपनी ITI Limited का 1 मई 2024 का एक कथित पत्र प्रस्तुत किए जाने की बात कही जा रही है। बताया जा रहा है कि इस पत्र में निजी कंपनी TDPL को तीन भर्ती परीक्षाओं से संबंधित काम देने का उल्लेख है, जिनमें 11वीं से 13वीं JPSC की प्रारंभिक परीक्षा भी शामिल है।

लेकिन पत्र की तारीख ने इसकी प्रासंगिकता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। दरअसल, 11वीं से 13वीं JPSC की प्रारंभिक परीक्षा 17 मार्च 2024 को आयोजित हुई थी और उसका परिणाम 22 अप्रैल 2024 को ही घोषित हो चुका था। ऐसे में परिणाम प्रकाशित होने के नौ दिन बाद, 1 मई को उसी परीक्षा की OMR स्कैनिंग और परिणाम तैयार करने का काम किसी दूसरी कंपनी को सौंपने की बात कैसे हो सकती है? बताया जा रहा है कि इस कथित पत्र में दो सप्ताह के भीतर समझौता करने का निर्देश भी दिया गया है। ऐसे में केवल वर्क ऑर्डर जारी होने से यह साबित भी नहीं होता कि दोनों कंपनियों के बीच वास्तव में कोई समझौता हुआ था या TDPL ने उस परीक्षा में काम किया था। पत्र कहां से आया, किसने जारी किया और क्या ITI Limited ने इसकी आधिकारिक पुष्टि की है, इसे लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। गौरतलब है कि 11वीं से 13वीं JPSC की प्रारंभिक और मुख्य परीक्षाएं ITI Limited द्वारा कराई गई थीं, जबकि साक्षात्कार आयोग द्वारा गठित बोर्ड ने लिए थे। इन तीनों चरणों के वास्तविक संचालन में TDPL की प्रत्यक्ष भूमिका स्थापित करने वाले प्रमाणों को लेकर सवाल बने हुए हैं। साथ ही केवल TDPL के परीक्षा में शामिल हो जाने मात्र से पूरी परीक्षा का दूषित होना साबित नहीं होता इसके लिए सरकार को ठोस साक्ष्य न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करने होंगे। हालांकि, अंतिम परिणाम के तकनीकी प्रसंस्करण और साक्षात्कार में कथित अनियमितताओं के आरोप भी जांच के दायरे में हैं।

आंदोलनकारी संगठनों के रुख: पहले कहा 'रद्द मतलब रद्द', अब कह रहे पहले नैसर्गिक न्याय का पालन जरूरी
इस पूरे विवाद का तीसरा महत्वपूर्ण पहलू परीक्षा रद्द कराने के लिए आंदोलन करने वाले JPSC-JSSC रिफॉर्म मंच और अन्य आंदोलनकारी संगठनों के रुख को लेकर है। अगस्त में इन्हीं संगठनों के बैनर तले हजारों अभ्यर्थियों ने परीक्षा में गड़बड़ी के खिलाफ आंदोलन किया था। आंदोलन के दौरान सरकार से परीक्षाएं तत्काल रद्द करने की पुरजोर मांग की गई थी। सरकार पर लगातार दबाव बनाया गया और आखिरकार सरकार ने परीक्षाएं रद्द करने का फैसला ले लिया। इसे आंदोलन की सफलता के रूप में देखा गया। लेकिन अब उसी आंदोलन से जुड़े कुछ नेता सरकार के फैसले की प्रक्रिया पर सवाल उठा रहे हैं। उनका कथित तौर पर कहना है कि सरकार को पहले पूरी जांच करानी चाहिए थी और चयनित अभ्यर्थियों को अलग-अलग नोटिस देने के बाद ही नियुक्तियां रद्द करने का निर्णय लेना चाहिए था।
अब छात्रों की ओर से यह सवाल उठ रहा है कि जब सरकार जांच के बाद कार्रवाई करने की बात कर रही थी, तब तत्काल परीक्षा रद्द करने का दबाव क्यों बनाया गया? और जब सरकार ने आंदोलनकारियों की मांग के अनुरूप परीक्षाएं रद्द कर दीं, तो अब उसी फैसले की प्रक्रिया को गलत क्यों बताया जा रहा है? आंदोलन के समय तत्काल रद्द करने की मांग और बाद में जांच पर जोर देना और अब ये कहना कि जांच पूरी होने तक न्यायालय को रूकना चाहिए यह विरोधाभास की स्थिति उत्पन्न कर रही है।
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परीक्षा सुधार की दिशा में हुई प्रगति पर भी उठाए सवाल
इस पूरे आंदोलन का एक अन्य महत्वपूर्ण उद्देश्य JPSC और JSSC की परीक्षा व्यवस्था में स्थायी सुधार लाना भी था, ताकि भविष्य में युवाओं को ऐसी परिस्थितियों का सामना न करना पड़े। लेकिन अब सवाल उठ रहा है कि परीक्षा रद्द कराने के बाद वास्तविक सुधार की दिशा में कितना काम हुआ? परीक्षा रद्द करने के दिन ही परीक्षा सुधार के लिए समिति के गठन की घोषण जरूर हुई, लेकिन उसके बाद समिति की ओर से अभी तक एक भी बैठक होने अथवा सरकार को कोई रिपोर्ट सौंपने की सूचना नहीं है। सवाल केवल आंदोलनकारी संगठनों से ही नहीं, सरकार से भी है कि परीक्षाएं रद्द करने के बाद युवाओं को पारदर्शी और समयबद्ध भर्ती व्यवस्था देने के लिए अब तक क्या ठोस कदम उठाए गए? आखिर जिस आंदोलन का नाम ही रिफॉर्म था, उसके वास्तविक सुधार कब जमीन पर दिखाई देंगे? फिलहाल झारखंड हाईकोर्ट ने 11वीं से 13वीं JPSC के चयनित अधिकारियों की नियुक्तियां रद्द करने के सरकारी आदेश पर अंतरिम रोक लगा रखी है। मामले में अंतिम फैसला आना बाकी है। परीक्षा में गड़बड़ी करने वालों पर कठोर कार्रवाई के साथ निर्दोष अभ्यर्थियों के हितों की रक्षा और भविष्य की परीक्षाओं में पारदर्शिता सुनिश्चित करना भी जरूरी है। अब निगाहें इस बात पर हैं कि सरकार और आंदोलनकारी संगठन परीक्षा रद्द करने के विवाद से आगे बढ़कर भर्ती व्यवस्था में वास्तविक सुधार की दिशा में क्या कदम उठाते हैं।
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