जीतेंद्र कुमार
नौकरशाही के शीर्ष स्तर पर अब भ्रष्टाचार का नया तरकीब ढूंढ लिया गया है। जिलों से लेकर सचिवालय तक इसके सोदाहरण मिलने लगे हैं। इसमें हींग लगे न फिटकिरी, रंग चोखा हो जाए, वाली कहावत सटीक बैठती है। कहने का मतलब यह कि इस नये तरकीब में बड़े अधिकारियों की ना तो सीधी भूमिका होती है और ना ही पूंजी निवेश करना होता है। इसके उलट कमीशन की राशि कई गुणा बढ़ जाती है। कहानी नहीं सच्चाई, झारखंड के रामगढ़ जिले की है। वहां एक बड़े पद पर मैम साहब बैठी थी। मैम को जिले में जिला खनिज फाउंडेशन ट्रस्ट(डीएमएफटी) की राशि से कुछ विकास कर देने का मन हो आया। आनन फानन में कार्यपालक अभियंता साहब को डीपीआर बनाने का फरमान जारी हुआ। बताते हैं कि एग्जक्युटिव इंजीनियर साहब ने तत्काल आदेश का पालन किया। सात से आठ करोड़ का डीपीआर बना दिया। लेकिन जब डीपीआर की राशि के बारे में पता चला तो अभियंता साहब को इसे और बढ़ा कर बनाने का आदेश हुआ। क्या था डीपीआर की राशि बढ़ कर लगभग 12 करोड़ हो गयी।
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अब शुरू हुआ नया खेल। कार्यपालक अभियंता को बुलाया गया। पूछा गया, सच बताओ इस निर्माण पर वास्तविक राशि कितनी खर्च होगी। बेचारा एग्जक्युटिव इंजीनियर बेवाक बोल गया। बताया कि इस पर लगभग 7-8 करोड़ की राशि खर्च होगी। इसके बाद जो आदेश जारी हुआ, उसे सुन आप भी दंग रह जाएंगे। कार्यपालक अभियंता को आदेश हुआ, दो करोड़ यहां दे दो। शेष राशि में तुम लोग अपना काम कर लो। इस तरह बंटवारा हो गया। जानकार बताते हैं कि डीएमएफटी फंड से हुए उस निर्माण कार्य की जांच करा ली जाए, तो सब कुछ स्पष्ट हो जाएगा। दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा। लेकिन सत्ता के गलियारे में नौकरशाहों से संबंध रखने वाले जानकार बताते हैं कि यह प्रचलन तेजी से पांव फैला रहा है। इस तरकीब का तेजी से विकास हो रहा है।
