द फॉलोअप डेस्क
हजारीबाग जिलांतर्गत केरेडारी प्रखंड के लगभग दो हजार परिवार सीसीएल से उचित मुआवजे को लेकर परेशान हैं। हलकान हैं। सीसीएल और हजारीबाग जिला प्रशासन के स्तर पर मुआवजे के विवाद को नहीं सुझाये जाने के बाद चंद्रगुप्त कोल परियोजना से प्रभावित होनेवाले रैयतों को झारखंड हाईकोर्ट का का दरवाजा खटखटाना पड़ा है। वर्ष 2023 में अलग अलग रैयतों द्वारा दाखिल की गयी 200 याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने 2 मई 2025 को प्रभावित 72 रैयतों को सक्षम प्राधिकार के पास अपना दावा पेश करने का आदेश भी दिया है। लेकिन जिला प्रशासन के स्तर पर सक्षम प्राधिकार द्वारा पारदर्शी और निष्पक्ष निर्णय नहीं लिए जाने के बाद इन रैयतों द्वारा फिर हाईकोर्ट में अवमानना याचिका भी दाखिल की गयी है। प्रभावित रैयत अब झारखंड हाईकोर्ट के अगले फैसले पर टकटकी लगाए हुए हैं।

क्या है पूरा मामला
हजारीबाग के केरेडारी प्रखंड के लगभग छह गावों पचरा, सिजुआ, नौवाखाप, बुकरू, जोरदार, चट्टी बरियातु, की लगभग 3331.50 एकड़ जमीन को सीसीएल ने चंद्रगुप्त कोल परियोजना के लिए 28 अक्तूबर 2015 को कोल बियरिंग एक्ट के तहत अधिग्रहण कर लिया। कई वर्षों तक इससे प्रभावित होनेवाले लगभग दो हजार परिवारों को इसकी आधिकारिक जानकारी भी नहीं मिली। उन्हें इसकी भनक तब मिली जब कुछ रैयत मजबूरी में अपनी जमीन बेचने के लिए रजिस्ट्री कार्यालय पहुंचे। उन्हें वहां बताया गया कि संबंधित जमीन सीसीएल द्वारा अधिग्रहित कर ली गयी है, इसलिए इस जमीन की खरीद-बिक्री नहीं हो सकती है। मालूम हो कि सीबी एक्ट के तहत जमीन अधिग्रहित होते ही एक्ट की धारा-9 के तहत जमीन की खरीद-बिक्री पर तत्काल प्रभाव से रोक लग जाती है। इसके बाद प्रभावित क्षेत्र के रैयत एकजुट होने लगे। इन लोगों ने पहले सीसीएल के बड़े अधिकारियों और फिर जिला प्रशासन के पास अपनी बात रखने की पूरी कोशिश की। उसमें रैयतों का तर्क था कि केंद्र सरकार ने 2013 में नया भूमि अधिग्रहण कानून बना दिया है। इसलिए उन्हें नये भूमि अधिग्रहण कानून के तहत मुआवजा का भुगतान होना चाहिए। रैयतों का यह भी तर्क है कि 28 अगस्त 2015 को केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय ने विधि मंत्रालय के परामर्श से एक गजट का प्रकाशन किया। उसमें भी यह स्पष्ट किया गया कि अगर एक सितंबर 2015 से पहले अगर कोई भूमि सीबी एक्ट के तहत अधिग्रहित किया गया हो, लेकिन रैयतों को अवार्ड नहीं किया गया हो तो 2013 का भूमि अधिग्रहण कानून प्रभावी होगा। केरेडारी के रैयतों का भी कहना है कि एक सितंबर 2015 तक उनकी जमीन को अवार्ड नहीं किया गया।
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इतना ही नहीं रैयतों का यह भी तर्क है कि 2013 के भूमि अधिग्रहण कानून आजादी के बाद भूमि अधिग्रहण को लेकर अलग अलग समय पर बने 13 अन्य कानूनों को सुपरसीड करेगा। उन पर भी प्रभावी होगा। उनमें प्राचीन स्मारक एवं पुरातत्व धरोहर अधिनियम 1962, परमाणु ऊर्जा अधिनियम 1961, दामोदर घाटी कॉरपोरेशन अधिनियम 1948, भारतीय ट्राम-वे अधिनियम 1986, खदान भूमि अधिग्रहण अधिनियम 1885, मेट्रो रेलवे निर्माण कार्य अधिनियम 1978, राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनियम 1956, पेट्रॉलियम एवं खनिज पाइप लाइन भूमि अधिग्रहण अधिनियम 1962, विस्थापित पुनर्वास अधिनियम 1948, कोयला धारण क्षेत्र विकास अधिनियम 1957, बिजली अधिनियम 2003, रेलवे अधिनियम 1989 एवं द रिक्युशिनिंग एंव एक्विजिशन ऑफ प्रॉपर्टी एक्ट 1952. इसलिए केरेडारी के रैयतों को 2013 के भूमि अधिग्रहण कानून के तहत ही मुआवजा मिलना चाहिए। यहां मालूम हो कि 2013 के भूमि अधिग्रहण कानून के के तहत फेयर और एकमुश्त मुआवजा मिलने पर रैयतों को काफी लाभ होगा, जबकि सीबी एक्ट के तहत रैयतों को मामूली मुआवजा और लाभ मिल सकेगा।
सीसीएल की भूमिका और जिला प्रशासन की निष्क्रियता पर गंभीर सवाल
रैयतों के हक के लिए बुकरू गांव निवासी रविशंकर पांडेय का कहना है कि सीसीएल की भूमिका और हजारीबाग जिला प्रशासन की निष्क्रियता पर कई गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। उनका कहना है कि हाईकोर्ट ने अपने फैसले में रैयतों को सक्षम प्राधिकार के पास अपना दावा प्रस्तुत करने का आदेश दिया है। लेकिन जिला प्रशासन ने दावा प्रस्तुत करने के लिए रैयतों को सीसीएल के पास जाने और समझौता करने का आदेश जारी कर दिया। जबकि हाईकोर्ट ने सक्षम प्राधिकार मतलब कलक्टर या डीएलओ के पास दावा करने का आदेश दिया है। उनका कहना है कि पूरे मामले में जिला प्रशासन की भूमिका संदिग्ध है। जिला प्रशासन और सीसीएल की मिलीभगत से रैयतों को उलझाया और बरगलाया जा रहा है। उनकी हकमारी करने की कोशिश की जा रही है। हालांकि उनका यह भी कहना है कि विधि सम्मत मुआवजा नहीं मिलने पर वे इस लड़ाई को अंतिम दम तक लड़ेंगे। वैसे उन्हें कोर्ट पर पूरा भरोसा है और आशा है कि न्याय मिलेगा।
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