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न्याय और अधिकारों के लिए मुसलमानों को एकजुट होकर संघर्ष करना होगा: एस. अली

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साहिबगंज

मुस्लिम समुदाय के अधिकारों और न्याय से जुड़े मुद्दों को लेकर उधवा प्रखंड के प्यारपूर बाजार में मुत्तहेदा मुस्लिम महाज की ओर से महाबैठक आयोजित की गई। मुख्य अतिथि और झारखंड छात्र संघ के अध्यक्ष एस. अली ने कहा कि 12वीं से 18वीं शताब्दी तक संथाल परगना क्षेत्र में मुस्लिम शासन रहा, जिसने देश की उन्नति में अहम भूमिका निभाई। आज़ादी के आंदोलन से लेकर अलग झारखंड राज्य की मांग तक—मुसलमानों का योगदान यादगार रहा है। उन्होंने कहा कि बंगला भाषी होने के आधार पर समुदाय के लोगों को “बांग्लादेशी घुसपैठिया” कहकर प्रताड़ित किया जा रहा है, जबकि इस मुद्दे पर दायर याचिका में केंद्र सरकार हाईकोर्ट में जवाब तक दाखिल नहीं कर सकी है।
एस. अली ने आरोप लगाया कि संयुक्त बिहार काल में मिले कई अधिकार झारखंड में धीरे-धीरे छीने जा रहे हैं।


उन्होंने कहा-
•    जैक द्वारा 2003 से 2023 तक दी गई आलिम–फाजिल डिग्री की मान्यता शिक्षा विभाग समाप्त करने पर आमादा है।
•    सहायक आचार्य बहाली में शामिल आलिम डिग्री धारकों का रिजल्ट पेंडिंग रखा गया है।
•    543 उर्दू स्कूलों का स्टेटस हटाकर उन्हें सामान्य विद्यालय बना दिया गया।
•    बिहार से मिले 4401 उर्दू सहायक शिक्षकों के पदों में से 3712 रिक्त पदों को सरेंडर किया गया और ग्रेड पे भी आधा कर दिया गया।
•    राज्य में हुई 68 मॉब लिंचिंग की घटनाओं को रोकने के लिए सदन से पारित भीड़ नियंत्रण बिल अब तक लागू नहीं हुआ।
•    मुख्यमंत्री रोजगार सृजन योजना में अल्पसंख्यक समुदाय के लिए अलग से बजट नहीं होता।
•    उत्तर प्रदेश की तर्ज पर भैंस-वंशीय पशुओं के स्लॉटर की अनुमति नहीं मिलती।
•    वक्फ बाय यूजर के तहत सरकारी भूमि पर बने धार्मिक स्थलों को पट्टा जारी नहीं किया जा रहा।
•    और सरकारी–निजी नौकरियों में मुस्लिम युवाओं की भागीदारी बेहद कम बनी हुई है।
इन सभी सवालों को लेकर 5 दिसंबर 2025 को पूरे राज्य में बड़े पैमाने पर हस्ताक्षर अभियान चलाया जाएगा।
महाबैठक की अध्यक्षता मौलाना फारूक हुसैन शम्सी ने की और संचालन हाफिज सईद अख्तर ने किया।
कार्यक्रम में मौलाना फजलूल कदीर अहमद, प्रो. नजरूल इस्लाम, अनवर अली, डॉ. नजरूल इस्लाम, अहमद रज़ा, मुफ्ती मोताहिर हुसैन, मौलाना अब्दुल खालिक, मुफ्ती रईसुद्दीन, हाजी कमालुद्दीन, मौलाना शहबाज, शहबुद्दीन शेख, अब्लु कलाम, महबूब आलम, शहजूल आलम, महफूज आलम समेत बड़ी संख्या में उलेमा और बुद्धिजीवी शामिल हुए।


 

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