द फॉलोअप डेस्क, रांचीः
भादो की एकादशी आते ही झारखंड के गांवों का रंग बदलने लगता है। घरों और अखरों में जावा की टोकरियां सजती हैं, सुबह-शाम लोकगीतों की गूंज सुनाई देती है और करम डाली लाने की तैयारी शुरू हो जाती है। बहनें भाइयों की लंबी उम्र, सुख और समृद्धि की कामना के लिए उपवास रखती हैं। शाम होते ही करम डाली के चारों ओर पूजा होती है और इसके बाद मांदर की थाप पर करमा और झूमर नृत्य से अखाड़े देर रात तक गुलजार रहते हैं। करमा पर्व झारखंड के साथ बिहार, छत्तीसगढ़, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, असम, मध्य प्रदेश और पूर्वी उत्तर प्रदेश के कुछ इलाकों में भी अलग-अलग समुदायों और लोक परंपराओं के साथ मनाया जाता है। भारत से बाहर नेपाल के तराई क्षेत्रों और बांग्लादेश के कुछ आदिवासी समुदायों में भी इससे जुड़ी परंपराएं देखने को मिलती हैं। करमा केवल पूजा का पर्व नहीं है, बल्कि प्रकृति, कृषि, मेहनत, सामुदायिक जीवन, युवा उत्सव और भाई-बहन के रिश्ते से जुड़ी लोक परंपरा है। अलग-अलग इलाकों में इसकी मान्यताएं और पूजा का स्वरूप थोड़ा अलग जरूर है, लेकिन करम वृक्ष, जावा, गीत-संगीत और सामूहिक उत्सव इसकी पहचान बने हुए हैं।

सात या नौ दिन पहले शुरू होती है जावा जगाने की परंपरा
करमा की तैयारी मुख्य पर्व से कई दिन पहले शुरू हो जाती है। इसे जावा जगाना कहा जाता है। बांस की छोटी टोकरियों में साफ बालू भरकर जौ, गेहूं, मकई, कुर्थी, उड़द, मूंग और चना जैसे अनाज बोए जाते हैं। कई जगह सात तो कहीं नौ प्रकार के अनाज बोने की परंपरा है। इन टोकरियों को घर या अखाड़े के पवित्र स्थान पर रखा जाता है। महिलाएं और लड़कियां रोज सुबह-शाम जावा में पानी डालती हैं और उसके चारों ओर घूमकर पारंपरिक गीत गाती हैं। कुछ ही दिनों में बालू से अनाज के नन्हे अंकुर बाहर आने लगते हैं। यही जावा करमा पूजा का महत्वपूर्ण हिस्सा बन जाता है। लोकविश्वास में जावा के अंकुर हरियाली, अच्छी फसल और खुशहाली के प्रतीक माने जाते हैं। जावा जगाने की यह परंपरा कृषि आधारित जीवन और प्रकृति के साथ मनुष्य के रिश्ते को भी सामने लाती है।
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जंगल से गांव तक सम्मान के साथ लाई जाती है करम डाली
भादो एकादशी के दिन करमा पर्व का मुख्य आयोजन होता है। गांव के युवा और पाहन जंगल जाकर करम वृक्ष की पूजा करते हैं। इसके बाद करम की डालियां काटी जाती हैं। कई जगह तीन डालियां लाने की परंपरा है। इन्हें सम्मान के साथ गांव लाया जाता है। रास्ते में गीत और मांदर की थाप होती है। इसके बाद करम डालियों को गांव के अखरा या घर के आंगन में स्थापित किया जाता है। करम डाली के चारों ओर जावा की टोकरियां सजाई जाती हैं और शाम की पूजा की तैयारी शुरू होती है। इस दौरान अखरा सिर्फ पूजा का स्थान नहीं रहता, बल्कि पूरे गांव के सामूहिक मिलन का केंद्र बन जाता है।

भाई की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि की कामना
शाम को महिलाएं और बहनें नए कपड़े पहनकर पूजा स्थल पर पहुंचती हैं। पूजा की थाली में कुमकुम, अक्षत, फूल, दीपक और जावा सजाया जाता है। करम देवता को फल-फूल अर्पित किए जाते हैं। पूजा के दौरान बहनें अपने भाइयों की लंबी उम्र, सुख और समृद्धि की कामना करती हैं। कई क्षेत्रों में भाइयों की कलाई पर करम डोर बांधने की परंपरा है। पूजा के बाद जावा को प्रसाद के रूप में बांटा जाता है और महिलाएं इसे अपने बालों में भी लगाती हैं। इस तरह करमा पर्व में भाई-बहन के रिश्ते के साथ परिवार और समुदाय के बीच जुड़ाव भी मजबूत होता है।
कर्मा-धर्मा की कथा में छिपा है अच्छे कर्म और प्रकृति सम्मान का संदेश
करमा पूजा के दौरान कर्मा-धर्मा की कथा सुनाने की परंपरा है। लोककथा के अनुसार कर्मा और धर्मा दो भाई थे। कर्मा मेहनत और कर्म को महत्व देता था, जबकि धर्मा पूजा-पाठ और धार्मिक आचरण में विश्वास रखता था। कथा के अनुसार कर्मा के परदेश से लौटने पर उसने घर और गांव के लोगों को करम वृक्ष के नीचे पूजा और नाच-गाने में व्यस्त देखा। अपने स्वागत न होने से वह नाराज हो गया और क्रोध में करम डाली को उखाड़कर नदी में फेंक दिया। इसके बाद परिवार पर संकट आने लगा। धन-संपत्ति खत्म हो गई और जीवन कठिनाइयों से भर गया। अपनी गलती का एहसास होने पर कर्मा करम देवता की खोज में निकल पड़ा। उसे करम डाली वापस मिली। उसने क्षमा मांगी और उसे सम्मानपूर्वक स्थापित कर पूजा की। इसके बाद उसके जीवन में फिर सुख-समृद्धि लौट आई। कथा का मूल संदेश प्रकृति के सम्मान, अच्छे कर्म और अपनी भूल को स्वीकार करने से जुड़ा है। यही कारण है कि करमा की रात सिर्फ पूजा नहीं होती, बल्कि लोककथाओं के जरिए नई पीढ़ी को परंपरा और जीवन-मूल्यों से भी जोड़ा जाता है।
सात भाइयों और करम रानी की कथा भी है प्रचलित
करमा से जुड़ी एक दूसरी लोककथा सात भाइयों और करम रानी की है। सात भाई खेती करते थे। एक दिन उनकी पत्नियां खेत में खाना पहुंचाने के बजाय करमा पूजा और नृत्य में शामिल हो गईं। भूखे भाई घर लौटे और गुस्से में करम डाली को उखाड़कर नदी में बहा दिया। इसके बाद परिवार पर संकट आने लगा। जब भाइयों को अपनी गलती का एहसास हुआ तो उन्होंने करम देवता को फिर स्थापित किया और विधि-विधान से पूजा की। इसके बाद उनके जीवन में खुशहाली लौट आई। अलग-अलग इलाकों में कथा के स्वरूप और पात्रों में अंतर मिल सकता है, लेकिन प्रकृति के सम्मान और अच्छे कर्म का संदेश लगभग समान रहता है।
झारखंड में करमा प्रकृति, खेती और भाई-बहन के रिश्ते से जुड़ा
झारखंड में करमा पर्व का एक प्रमुख पक्ष भाई-बहन के रिश्ते से जुड़ा है। बहनें भाइयों की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि की कामना करती हैं। साथ ही यह पर्व कृषि और प्रकृति से भी गहराई से जुड़ा है। जावा में उगाए गए अनाज, करम वृक्ष की पूजा और अच्छी फसल की कामना ग्रामीण जीवन की तस्वीर पेश करते हैं। गांवों में करमा का मुख्य केंद्र अखरा होता है। यहां पूरा समुदाय एक साथ जुटता है। पूजा के बाद गीत और नृत्य का दौर शुरू होता है। शहरों में भी अब सामुदायिक मैदानों, मोहल्लों और सांस्कृतिक आयोजनों के जरिए करमा की परंपरा को आगे बढ़ाया जा रहा है।
बिहार से छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश तक दिखती है करमा की अलग-अलग छटा
झारखंड की सीमा से लगे बिहार के इलाकों, खासकर दक्षिणी बिहार में करमा की परंपरा कई समुदायों में देखने को मिलती है। यहां भी करम देवता की पूजा, जावा और सामूहिक नृत्य पर्व का हिस्सा हैं। भाई-बहन के रिश्ते और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना के साथ कृषि और अच्छी उपज की मान्यता भी इससे जुड़ी है। छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश के कई आदिवासी इलाकों में करमा पर्व का संबंध करम देवता के साथ-साथ कर्म, मेहनत और सामुदायिक जीवन से जोड़ा जाता है। गोंड, बैगा और उरांव सहित कई समुदायों में करमा नृत्य की विशेष पहचान है। मान्यता और स्थानीय परंपराओं के अनुसार करम देवता की पूजा और नृत्य के जरिए अच्छी फसल, स्वास्थ्य और समृद्धि की कामना की जाती है। यहां करमा का सांस्कृतिक पक्ष काफी मजबूत दिखाई देता है। मांदर और पारंपरिक वाद्ययंत्रों की थाप पर सामूहिक नृत्य पर्व का प्रमुख आकर्षण बनता है।
ओडिशा में करमसानी देवी तो असम में सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ने का अवसर
ओडिशा के कुछ आदिवासी और ग्रामीण कृषक समुदायों में करमा की परंपरा का स्वरूप अलग दिखाई देता है। कुछ लोक परंपराओं में करम वृक्ष की डाली को करमसानी देवी के रूप में पूजा जाता है। यहां इसे फसल, उर्वरता और परिवार की समृद्धि से जोड़ा जाता है। यानी जहां झारखंड में करम देवता की पूजा का स्वरूप प्रमुख है, वहीं ओडिशा की कुछ परंपराओं में करमसानी देवी का स्वरूप सामने आता है। वहीं असम के चाय बागान क्षेत्रों में रहने वाले टी-ट्राइब समुदायों के बीच भी करमा पर्व महत्वपूर्ण है। इन समुदायों के पूर्वजों का एक बड़ा हिस्सा छोटानागपुर क्षेत्र से वहां जाकर बसा था। ऐसे में करमा उनके लिए सिर्फ धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक जड़ों और परंपराओं से जुड़े रहने का अवसर भी है। यहां भी प्रकृति के प्रति आभार, बेहतर जीवन, समृद्धि और सुखी भविष्य की कामना के साथ करमा मनाया जाता है। युवतियों और युवाओं की भागीदारी से पर्व का सामुदायिक स्वरूप मजबूत होता है।
पश्चिम बंगाल और पड़ोसी देशों तक पहुंची करमा की लोक परंपरा
पश्चिम बंगाल के पुरुलिया, झाड़ग्राम और कुछ चाय बागान क्षेत्रों में करमा से जुड़ी लोक परंपराएं देखने को मिलती हैं। यहां भी करम वृक्ष, गीत, नृत्य और सामूहिक उत्सव पर्व की पहचान हैं। अलग-अलग समुदायों के बीच पूजा की विधि और मान्यताओं में स्थानीय बदलाव दिखाई देते हैं। करमा पर्व की परंपरा भारत की सीमाओं तक भी पहुंचती है। नेपाल के तराई क्षेत्रों और बांग्लादेश के कुछ आदिवासी समुदायों में भी करमा से जुड़ी पूजा और सांस्कृतिक आयोजन किए जाते हैं। यहां भी प्रकृति, कृषि, सामुदायिक जीवन और लोक संस्कृति इसके केंद्र में रहते हैं।
मांदर की थाप पर रातभर गूंजते हैं करमा और झूमर के गीत
पूजा खत्म होते ही अखाड़े का माहौल बदल जाता है। मांदर, ढोल और नगाड़ों की थाप के साथ करमा और झूमर नृत्य शुरू होता है। पुरुष और महिलाएं हाथों में हाथ डालकर गोल या अर्धवृत्ताकार घेरे में नृत्य करते हैं। करमा गीतों में खेत-खलिहान, बारिश, पेड़-पौधे, प्रेम, परिवार और भाई-बहन के रिश्तों की झलक मिलती है। यह नृत्य सिर्फ मनोरंजन नहीं है, बल्कि लोक समुदायों के लिए अपनी सांस्कृतिक पहचान को अभिव्यक्त करने और पीढ़ियों के बीच परंपरा को आगे बढ़ाने का माध्यम भी है। गीतों में खेती की बात होती है, प्रकृति की बात होती है और जीवन के सुख-दुख भी शामिल होते हैं।
नई पीढ़ी से जुड़ रहा पारंपरिक पर्व
समय के साथ जीवनशैली बदली है, लेकिन करमा की परंपरा अब भी नई पीढ़ी को जोड़ रही है। गांवों में जहां परंपरागत तरीके से अखड़ों में आयोजन होते हैं, वहीं शहरों में सामुदायिक मैदानों और सांस्कृतिक मंचों पर भी करमा मनाया जाने लगा है। युवा मांदर, गीत और नृत्य के साथ इसमें भाग लेते हैं। सोशल मीडिया और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के जरिए भी लोकगीत और नृत्य की जानकारी नई पीढ़ी तक पहुंच रही है। इस तरह बदलते समय के साथ करमा का आयोजन और अभिव्यक्ति का तरीका जरूर बदल रहा है, लेकिन इसकी मूल लोक परंपराएं आज भी लोगों को अपनी संस्कृति से जोड़ रही हैं।
प्रकृति संरक्षण और सामुदायिक जीवन का संदेश
करमा पर्व का एक महत्वपूर्ण संदेश प्रकृति के साथ मनुष्य के रिश्ते से जुड़ा है। जिस करम वृक्ष की डाली को पूजा जाता है, वह केवल पूजा की वस्तु नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति सम्मान का प्रतीक है। जावा में अलग-अलग अनाज बोने से लेकर अच्छी फसल की कामना तक पूरा पर्व कृषि और पर्यावरण से जुड़ा दिखाई देता है। करमा की लोककथाएं भी प्रकृति के अपमान के परिणाम और उसके सम्मान की महत्ता बताती हैं। यही वजह है कि करमा को केवल धार्मिक पर्व के रूप में नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी और सामुदायिक जीवन के संदेश से जुड़े लोकपर्व के रूप में भी देखा जाता है।
करम डाली के विसर्जन के साथ होता है पर्व का समापन
अगली सुबह करम डाली की अंतिम पूजा होती है। इसके बाद डाली को सम्मानपूर्वक निकालकर नदी, तालाब या अन्य जलस्रोत में विसर्जित किया जाता है। इसके साथ पर्व का समापन होता है। जावा के छोटे-छोटे अंकुर से लेकर जंगल से लाई गई करम डाली, कर्मा-धर्मा की कथा, भाई की कलाई पर बंधती करम डोर और रातभर गूंजती मांदर की थाप, करमा पर्व में लोकजीवन के कई रंग एक साथ दिखाई देते हैं। अलग-अलग राज्यों में इसके रूप और मान्यताएं बदलती हैं, लेकिन प्रकृति, कृषि, सामुदायिकता और रिश्तों से इसका जुड़ाव बना रहता है।
जंगल से अखरा और खेत से घर तक पहुंचती है करमा की परंपरा
करमा इसलिए सिर्फ एक दिन का पर्व नहीं है। यह जंगल से अखरा तक, खेत से घर तक और एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचती ऐसी लोक परंपरा है, जिसमें प्रकृति के प्रति सम्मान, अच्छे कर्म, भाई-बहन के प्रेम और सामूहिक जीवन की धड़कन एक साथ सुनाई देती है। जावा की हरियाली, करम डाली की पूजा, लोककथाओं की सीख और मांदर की थाप के बीच करमा झारखंड और इससे जुड़े दूसरे क्षेत्रों के लोकजीवन, संस्कृति और सामुदायिक रिश्तों की एक जीवंत तस्वीर पेश करता है।