द फॉलोअप डेस्क
बिहार चुनाव में जेएमएम महागठबंधन से अलग हो गया है। मोर्चा 6 सीटों पर चुनाव लड़ेगा। ये सीटें हैं चकाई, धमदाहा, कटोरिया, पिरपैंती, मनीहारी, जमुई। जानकार सूत्रों के अनुसार झामुमो जल्द ही इसकी आधिकारिक घोषणा करेगा। सभी छह सीटें बिहार विधानसभा चुनाव के दूसरे चरण की है। इसलिए झामुमो ने कल पहले चरण के नामांकन की तिथि समाप्त होने के बाद इसका फैसला किया है। यहां मालूम हो कि झामुमो प्रारंभ में बिहार विधानसभा चुनाव में 16 सीटों देने की मांग कर रहा था। बाद में झामुमो 12 सीटों पर अड़ा। इसको लेकर पिछले दिनों झामुमो महासचिव विनोद कुमार पांडेय और मंत्री सुदिव्य कुमार सोनु पटना भी गए। वहां बिहार विधानसभा में प्रतिपक्ष के नेता तेजस्वी यादव, झारखंड प्रभारी जय प्रकाश नारायण यादव, भोला यादव व अन्य वरीय नेताओं से मिले। सीट शेयरिंग पर तेजस्वी के साथ लंबी बैठक हुई। लेकिन उस दिन कोई फलाफल नहीं निकला। सभी नेता पटना से लौट आए।

इसके बाद पिछले दिनों झामुमो महासचिव सुप्रियो भट्टाचार्य ने यह चेतावनी भी दी थी कि 15 अक्तूबर तक महागठबंधन झामुमो को 12 सीटें नहीं दी तो उनकी पार्टी अकेले चुनाव लड़ने का फैसला करेगी। हुआ वही, दो दिन और इंतजार करने के बाद झामुमो 18 अक्तूबर को अकेले ही छह सीटों पर चुनाव लड़ने का निर्णय कर लिया है। राजनीतिक सूत्रों का कहना है कि महागठबंधन में झामुमो के साथ हुई नाइंसाफी का असर आनेवाले दिनों में झारखंड में भी दिखेगा। झामुमो और राजद के बीच तनाव और तररार बढ़ने का यह कारक बनेगा। हालांकि झारखंड में हेमंत सरकार पर राजद के समर्थन वापस लेने का कोई असर पड़ने वाला नहीं है। लेकिन आनेवाले दिनों में इसका महागठबंधन और झामुमो-राजद-कांग्रेस के संबंधों पर जरूर दिखेगा।
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राजनीतिक प्रेक्षकों का यह भी मानना है कि जिन छह सीटों पर झामुमो ने अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया है, वह झामुमो का भी कमोवेश प्रभाव माना जाता है। इसलिए उन छह सीटों पर झामुमो के अकेले चुनाव लड़ने से वहां महागठबंधन के प्रत्याशियों को कमोवेश नुकसान अवश्यंभावी बताया जाने लगा है। मालूम हो कि पहले से ही बिहार की लगभग आठ नौ सीटों पर राजद, कांग्रेस, वीआईपी, सीपीआई और अन्य दल आपस में ही टकरा रहे हैं।
