द फॉलोअप, रांची
झारखंड में अस्त-व्यस्त एवं ध्वस्त एंबुलेंस सेवा को सुधारने की दिशा में स्वास्थ्य विभाग नयी व्यवस्था लागू करने जा रहा है। इसके लिए ने झारखंड में आम लोगों को ओला-उबर की तर्ज पर 108 एंबुलेंस की सुविधा देने का फैसला किया है। इसके लिए नया सिस्टम डेवलप किया जा रहा है। 108 आपातकालीन चिकित्सा सेवाओं (EMS) के लिए एकीकृत प्रौद्योगिकी प्लेटफॉर्म का डिजाइन, विकास, कार्यान्वयन, संचालन और रख रखाव के लिए नये सिरे से आरएफपी तैयार किया गया है। इस पर कैबिनेट की स्वीकृति लेने के बाद एंबुलेंस सेवा के लिए टेंडर आमंत्रित किया जाएगा। फिर एंबुलेंस उपलब्ध कराने के पुराने ढर्रे की जगह नयी तकनीक पर आधारित सेवा लागू की जाएगी। इसका उद्देश्य नया डिजिटल प्लेटफॉर्म बनाना ताकि एम्बुलेंस का रिस्पांस टाइम कम हो सके।

नयी एंबुलेंस सेवा के मुख्य फीचर
झारखंड में एक सेंट्रल स्टेट कमांड और कंट्रोल सेंटर होगा। वहां से एम्बुलेंस का रियल-टाइम लोकेशन ट्रैक होगा और उनकी सही तरीके से तैनाती (Hyperlocal dispatch) की जाएगी। टेंडर दो स्तर पर होगी। तकनीकी योग्यता और वित्तीय बोली। टेंडर के माध्यम से 'LCS' (Least Cost Based) यानी सबसे कम बोली लगाने वाले इस सेवा को संचालित करने की जिम्मेदारी दी जाएगी। टेंडर हासिल करने वाली एजेंसी को अग्रधन राशि के रूप में 50 लाख रुपए जमा करने होंगे। जो बिडर्स (Bidders) नहीं चुने जाएंगे, उनकी ₹50 लाख की बयाना राशि (EMD) टेंडर प्रक्रिया पूरी होने के बाद वापस कर दी जाएगी। GeM पोर्टल (https://gem.gov.in) के माध्यम से टेंडर 'MD, NHM, Namkum, Ranchi' के ऑफिस में जमा करने होंगे। सॉफ्टवेयर बनाने और लागू करने के लिए 7 महीने का समय दिया जाएगा। इसके बाद 5 साल तक ऑपरेशन और मेंटेनेंस की जिम्मेदारी होगी। यह प्लेटफॉर्म 'Hyperlocal' (स्थानीय स्तर पर) और 'Aggregator' (सबको एक साथ जोड़ने वाला) मॉडल पर काम करेगा। एम्बुलेंस भेजने के लिए ऑटोमेटेड सिस्टम और एल्गोरिदम का उपयोग होगा। पूरे राज्य को छोटे-छोटे क्षेत्रों (Zones) में बांटा जाएगा ताकि सेवा बेहतर हो सके।

वर्तमान में एंबुलेंस नेटवर्क
झारखंड के सभी 24 जिलों में फिलहाल 543 एम्बुलेंस का बेड़ा है। इसमें Basic Life Support और Advanced Life Support दोनों तरह के एम्बुलेंस शामिल हैं। नयी व्यवस्था में ग्रामीण, शहरी और दुर्गम (Hard-to-reach) इलाकों में भी एंबुलेंस ट्रैक किए जाएंगे। एम्बुलेंस भेजने के लिए सबसे नजदीकी उपलब्ध वाहन को प्राथमिकता देना (जैसे ओला/उबर काम करते हैं)। पूरा सिस्टम ऑटोमेटेड तो होगा, लेकिन सरकार और क्लिनिकल एक्सपर्ट्स का इस पर पूरा कंट्रोल रहेगा। इसमें प्राइवेट ऐप की तरह रेट कम-ज्यादा नहीं होंगे। सरकार के पास एक लाइव डैशबोर्ड होगा जिससे हर एम्बुलेंस की गतिविधि पर नजर रखी जा सकेगी। हर कॉल और हर एम्बुलेंस के मूवमेंट का पूरा रिकॉर्ड रखा जाएगा ताकि बाद में जांच की जा सके।
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