रांची
झारखंड हाईकोर्ट ने पेसा नियमावली 2025 को अधिसूचित किए जाने के बाद राज्य सरकार के खिलाफ दायर अवमानना याचिका को समाप्त कर दिया है। अदालत ने माना कि सरकार ने कोर्ट के निर्देशों का पालन करते हुए पेसा नियम बनाए हैं, इसलिए अवमानना कार्यवाही को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता। हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इससे विवाद पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है।
मुख्य न्यायाधीश महेश शरदचंद्र सोनक की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने यह टिप्पणी करते हुए आदिवासी बुद्धिजीवी मंच को पेसा नियमावली की वैधता को चुनौती देने के लिए नई जनहित याचिका (PIL) दाखिल करने की अनुमति दी। अदालत ने मंच की इस दलील पर संज्ञान लिया कि नए नियमों के जरिए संसद द्वारा 1996 में बनाए गए पेसा अधिनियम के तहत आदिवासियों को मिले अधिकारों में कटौती की गई है।
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मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि याचिकाकर्ताओं की आपत्तियां प्रथम दृष्टया गंभीर हो सकती हैं, लेकिन नियमों की वैधता की जांच अवमानना कार्यवाही के दायरे में नहीं की जा सकती। इसके लिए अलग से याचिका दाखिल करना ही उचित प्रक्रिया है, क्योंकि अवमानना मामलों की सीमा सीमित होती है।
सुनवाई के दौरान अदालत ने आदिवासी बुद्धिजीवी मंच द्वारा जनहित से जुड़े मुद्दों को उठाने की सराहना की। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि ऐसे संगठनों को प्रोत्साहन मिलना चाहिए और टिप्पणी की कि “इन्होंने वह काम किया है, जो राज्य को स्वयं करना चाहिए था।” इस पर महाधिवक्ता से पूछा गया कि सरकार इस दिशा में क्या सहयोग देगी। महाधिवक्ता ने जवाब दिया कि वे इस पर विचार करेंगे।

मामले में आदिवासी बुद्धिजीवी मंच की ओर से अधिवक्ता अभिषेक राय और ज्ञानंत सिंह ने पक्ष रखा। वहीं, अदालत ने मंच की एक अन्य जनहित याचिका, जिसमें अनुसूचित क्षेत्रों के शहरी इलाकों में नगरपालिका कानूनों के विस्तार को चुनौती दी गई है, उसकी अंतिम सुनवाई के लिए 11 मार्च की तारीख तय की है। कानूनी जानकारों के अनुसार, पेसा नियमावली को लेकर अब अगली लड़ाई उसकी संवैधानिक वैधता और आदिवासी अधिकारों पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर होगी, जिस पर हाईकोर्ट में विस्तार से विचार किया जाना बाकी है।
