द फॉलोअप, रांची
यह कहावत झारखण्ड सचिवालय सेवा के अधिकारियों/कर्मचारियों पर पूर्णतः लागू होता है। 15.11.2000 को झारखण्ड राज्य का निर्माण जिस अधिनियम (Act) से हुआ है, उसे बिहार पुनर्गठन अधिनियम, 2000 कहते हैं। इस अधिनियम की धारा 73 के तहत बिना केन्द्र सरकार की अनुमति के किसी भी कर्मचारी या सेवा संवर्ग की सेवा शर्तों में कोई भी नुकसानदेह बदलाव नहीं किया जा सकता है। लेकिन, झारखण्ड की सरकार ने इसका कभी पालन नहीं किया और वर्ष 1995 में नियुक्त सचिवालय सेवा के कर्मचारियों/पदाधिकारियों की प्रोन्नति के फार्मूले में मनमाना परिवर्तन कर दिया। जबकि ये सभी अविभाजित बिहार के समय से नियुक्त थे और नवगठित झारखण्ड सरकार का कार्य देखने के लिए इन्हें केन्द्र सरकार ने कनीय (जूनियर) मानकर झारखण्ड में रखा था। इनकी नियुक्ति के समय इन्हें सामान्य 50.50%, ओबीसीसी 27%, SC 15% एवं ST 7.5% के फार्मूले से नियुक्त किया गया था और यही फार्मूला प्रोन्नति में भी लागू किया जाना था।

नियुक्ति/प्रोन्नति हेतु वर्ष 2003-04 में झारखण्ड ने अपना नया फार्मूला बनाया जिसमें सामान्य वर्ग 50%, पिछड़ा वर्ग 14%, SC 10% एवं ST 26% पद आरक्षित किए गए। यह फार्मूला झारखण्ड में नयी नियुक्तियों/प्रोन्नतियों पर लागू किया जाना था। लेकिन झारखण्ड सरकार के कार्मिक, प्रशासनिक सुधार तथा राजभाषा विभाग ने इसे बिहार से आए कर्मियों की प्रोन्नति पर लागू कर दिया। इससे अविभाजित बिहार से आए सचिवालय सेवा के कर्मियों के प्रोन्नति पर बुरा असर पड़ा जबकि यह नहीं होना चाहिए था। इससे सामान्य, पिछड़े और अनुसूचित जाति वर्ग के सभी पदाधिकारियों की प्रोन्नति प्रभावित हुई है, जबकि अनुसूचित जाति वर्ग के कर्मियों की प्रोन्नति में तीन गुणा से ज्यादा वृद्धि हुई और सभी के सभी संयुक्त सचिव बना दिए गए।

इस बैच के लोगों के साथ अन्याय नहीं हो इसके लिए बिहार सरकार ने इस सेवा के पदसोपान के पदों में वृद्धि कर उप सचिव, संयुक्त सचिव के समानुपातिक पद सृजित कर प्रोन्नति दिया। जिससे 1995 बैच के एक भी कर्मी वहाँ उप सचिव भी नहीं है, सभी के सभी दो वर्ष पहले से ही संयुक्त सचिव हैं। जबकि 10 वर्षों से अधिक समय से झारखण्ड में इस बैच के पदस्थापित पदाधिकारी आज भी अवर सचिव ही हैं। इसके पहले प्रोन्नति हेतु पद सृजन पर छः वर्ष पूर्व ही माननीय मुख्यमंत्री श्री हेमन्त सोरेन ने सहमति दे दी थी परन्तु कार्मिक, प्रशासनिक सुधार तथा राजभाषा विभाग ने कैडर Revision के नाम पर संचिका को मँगाकर इसे पथ विचलित कर दिया। इसका परिणाम यह हो रहा है कि सचिवालय सेवा के वर्ष 1995 से नियुक्त कर्मियों की प्रोन्नति पूरी तरह बाधित है। बिहार से आए लोग धीरे-धीरे सेवानिवृत्त हो चुके हैं, अब इनकी संख्या 25% ही है जो वर्ष 2029 तक लगभग समाप्त हो जाएगी।

इस बीच बिहार सरकार ने वर्ष 2014 बैच के सचिवालय सेवा के कर्मियों को एक वर्ष पहले ही अपर सचिव बना दिया गया है। जबकि यहाँ 2013 बैच वाले भी प्रशाखा पदाधिकारी ही हैं। इस बीच कार्मिक, प्रशासनिक सुधार तथा राजभाषा विभाग ने कैबिनेट से संकल्प संख्या–3286 दिनांक–04.04.2014 में संशोधन करने का प्रस्ताव पारित कराया है। जिससे सचिवालय सेवा के प्रोन्नति को पूर्णतः बाधित करने का षड्यंत्र बताया है। सचिवालय सेवा के समस्त पदाधिकारी के बीच पद सृजन कर पदों में वृद्धि नहीं करने, संकल्प संख्या–3286 दिनांक–04.04.2014 में संशोधन करने से गहरा रोष व्याप्त है और कुछ संवर्ग वाले बोल रहे हैं कि चौबे आए छब्बे बनने दूबे बनकर रह गए बोल रहे हैं। कार्मिक, प्रशासनिक सुधार तथा राजभाषा विभाग द्वारा माननीय मुख्यमंत्री के आदेश की अनदेखी कर उठाए जा रहे दमनात्मक कदम से कभी भी सचिवालय का काम ठप हो सकता है।
(लेखक प्रोजेक्ट भवन में उप सचिव हैं)
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