द फॉलोअप डेस्क
योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ़ इंडिया, रांची आश्रम ने 30 नवंबर को एक विशेष आध्यात्मिक कार्यक्रम आयोजित कर गीता जयंती और श्रीमद्भगवद्गीता के प्राकट्य की पवित्र वर्षगांठ मनाई। इस वर्ष गीता जयंती 1 दिसंबर को मनाई जा रही है। यह दिन भारत और विश्वभर में उस दिव्य क्षण की याद दिलाता है, जब भगवान कृष्ण ने कुरुक्षेत्र के युद्धभूमि में अर्जुन को भगवद्गीता का अमर उपदेश दिया था। गीता का यह संदेश आज भी मानवता को धर्म-कर्म, आंतरिक संतुलन और आध्यात्मिक अनुभूति की ओर मार्गदर्शन करता है।
उत्सव के अवसर पर, वाईएसएस संन्यासी स्वामी ईश्वरानन्द गिरि द्वारा “निष्काम कर्म: आत्मा की मुक्ति का मार्ग” विषय पर हिन्दी में ऑनलाइन प्रवचन आयोजित किया गया। स्वामी जी ने परमहंस योगानन्द द्वारा श्रीमद्भगवद्गीता में दिए गए गहन विचारों को ध्यान में रखते हुए अध्याय II के श्लोक 47 से 51 तक का व्याख्यान किया। उन्होंने समझाया कि गीता जीवन में कर्तव्यों को पूरी निष्ठा के साथ निभाने और उनके परिणामों के प्रति अनासक्त रहने की शिक्षा देती है।
स्वामी ईश्वरानन्द ने योगानन्दजी के विचारों को स्पष्ट करते हुए बताया कि योगी ऊर्जा, निःस्वार्थ भाव और आंतरिक संतुलन के साथ कार्य करता है। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि सभी कार्यों के पीछे सच्चा कर्ता केवल ईश्वर हैं। योगानन्दजी द्वारा योग को "उचित कर्म करने की कला" के रूप में परिभाषित करते हुए, स्वामी जी ने स्पष्ट किया कि सही दृष्टिकोण, भक्ति और आंतरिक समर्पण कर्म को आध्यात्मिक मुक्ति के मार्ग में परिवर्तित कर देते हैं।
इस विशेष प्रवचन में योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ़ इंडिया के संस्थापक, विश्व-प्रसिद्ध आध्यात्मिक योगी और “कथामृत” के लेखक सहित कई अन्य साधकों ने भाग लिया। कार्यक्रम में सैकड़ों लोग व्यक्तिगत रूप से उपस्थित हुए, जबकि हजारों लोगों ने वाईएसएस के यूट्यूब चैनल पर सीधा प्रसारण देखकर भागीदारी की। इस आयोजन ने गीता के शाश्वत और कालातीत संदेश में लोगों की व्यापक रुचि को उजागर किया।
