चाईबासा:
West Singhbhum: पश्चिमी सिंहभूम में डायन-बिसाही के नाम पर महिलाओं की हत्या का सिलसिला थम नहीं रहा है। अंधविश्वास, आपसी रंजिश और जमीन विवाद के बीच महिलाओं को डायन-बिसाही के आरोप में निशाना बनाए जाने की घटनाएं समाज के सामने गंभीर सवाल खड़े कर रही हैं। मंझारी थाना क्षेत्र के सुदूरवर्ती तोरलो गांव के नीचे बासा में 70 वर्षीय बुजुर्ग महिला पुनी बिरूवा और उनकी 24 वर्षीय सौतेली बेटी नामशी बिरूवा की हत्या का मामला सामने आया है। आरोप है कि दोनों को डायन-बिसाही के नाम पर मौत के घाट उतारने के बाद उनके शवों को जंगल में ठिकाने लगाने की कोशिश की गई। पुलिस ने मामले में चार लोगों को हिरासत में लेकर जांच शुरू कर दी है। हालांकि, खबर लिखे जाने तक दोनों महिलाओं के शव बरामद नहीं हुए थे।
घटना 13 अक्टूबर की बताई जा रही है। पुनी बिरूवा उस उम्र में थीं, जब उन्हें परिवार और समाज के सहारे की जरूरत थी, जबकि नामशी बिरूवा की उम्र महज 24 वर्ष थी। दोनों की हत्या के आरोप ने इलाके में अंधविश्वास के नाम पर होने वाली हिंसा की भयावह तस्वीर फिर सामने ला दी है। प्रारंभिक जानकारी के अनुसार, दोनों महिलाओं पर डायन होने का आरोप लगाया गया था। मामले के पीछे आपसी विवाद और जमीन विवाद की आशंका भी जताई जा रही है। हालांकि, इन कारणों की पुष्टि जांच के बाद ही हो सकेगी।

चार लोग हिरासत में, जंगल में तलाशे जा रहे शव
मामले की जांच में जुटी पुलिस ने गांव के चार लोगों को हिरासत में लिया है। उनकी निशानदेही पर जंगल में दोनों महिलाओं के शवों की तलाश की जा रही है। सूत्रों के अनुसार, वारदात में आठ से दस लोगों के शामिल होने की आशंका है। मामले में कुछ अन्य संदिग्धों के गांव से फरार होने की भी जानकारी सामने आई है। आरोप है कि हत्या के बाद शवों को जंगल में ले जाकर जला दिया गया, ताकि घटना के साक्ष्य मिटाए जा सकें। हालांकि, शवों की बरामदगी नहीं होने के कारण इस संबंध में आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। पुलिस पूरे घटनाक्रम की कड़ियां जोड़ने और अन्य संदिग्धों की भूमिका का पता लगाने में जुटी है।

पश्चिमी सिंहभूम में महिलाओं की हत्या का सिलसिला
तोरलो की घटना जिले में डायन-बिसाही के आरोप से जुड़ी हालिया घटनाओं की कड़ी में एक और मामला है। बीते 24 अक्टूबर को कराईकेला थाना क्षेत्र के कोलजोमरो गांव में 46 वर्षीय रेंदाई सुंबरुई की हत्या कर दी गई थी। वह साधुचरण सुंबरुई की पत्नी थीं। इस घटना में भी डायन-बिसाही का आरोप सामने आया था। इससे पहले कुमारडुंगी थाना क्षेत्र के खड़बंध गांव के गोप टोला में देवेंद्र गोप की पत्नी 45 वर्षीय शरू गोप की निर्मम हत्या कर दी गई थी। आरोप था कि एक माह के बेटे की बीमारी को लेकर आरोपी महिला पर संदेह करता था। इसी अंधविश्वास में उसे हड़िया पिलाने के बहाने घर से बुलाया गया और सुनसान स्थान पर धारदार हथियार से गला रेतकर उसकी हत्या कर दी गई। वहीं, मई 2026 में सोनुवा थाना क्षेत्र की बोयकेड़ा पंचायत के बुंडूकोचा वनग्राम में 55 वर्षीय महिला की डायन होने के आरोप में गला रेतकर हत्या कर दी गई थी। आरोपियों ने साक्ष्य छिपाने के लिए शव को जंगल में फेंक दिया था।
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अंधविश्वास के नाम पर हिंसा, समाज के सामने बड़ा सवाल
डायन-बिसाही का आरोप केवल अंधविश्वास का मामला नहीं है, बल्कि इसके नाम पर महिलाओं को प्रताड़ित करने, सामाजिक रूप से अलग-थलग करने और उनकी हत्या तक कर देने की प्रवृत्ति का गंभीर उदाहरण है। कई मामलों में व्यक्तिगत रंजिश और पारिवारिक या जमीन विवाद को ऐसे आरोपों की आड़ मिलने की आशंका सामने आती है। तोरलो की घटना में भी पुलिस के सामने हत्या की वजह स्पष्ट करने के साथ दोनों महिलाओं के शव बरामद करने और वारदात में शामिल सभी लोगों की पहचान करने की चुनौती है।
सवाल यह है कि आधुनिक दौर में भी किसी महिला को डायन करार देकर उसकी जान लेने की मानसिकता आखिर क्यों बनी हुई है? कानून और प्रशासन की कार्रवाई अपनी जगह है, लेकिन जब तक गांवों में फैले अंधविश्वास, भय और सामाजिक भेदभाव के खिलाफ जागरूकता नहीं बढ़ेगी, तब तक ऐसी घटनाओं पर पूरी तरह अंकुश लगाना मुश्किल होगा। पुनी और नामशी की मौत के मामले में न्याय सुनिश्चित करने के साथ यह भी जरूरी है कि डायन-बिसाही के नाम पर किसी और महिला को हिंसा का शिकार न होना पड़े।