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संताल समाज की मांग : धार्मिक स्थल के रूप में अधिसूचित हों मरांग बुरु और लुगू बुरु, ग्राम सभा को मिले प्रबंधन का जिम्मा

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कुजू (रामगढ़)
 संथाल समाज दिशोम माँझी परगना के 30वें स्थापना दिवस के अवसर पर अक्षत बैंक्वेट हॉल, कुजू (नया मोड़) में आयोजित कार्यक्रम में आदिवासी अधिकारों, धार्मिक स्थलों के संरक्षण, भाषा-संस्कृति के विकास और विस्थापितों के अधिकारों से जुड़े 27 महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित किए गए। कार्यक्रम में केंद्र और राज्य सरकार से मांग की गई कि गिरिडीह स्थित मारांग बुरू (पारसनाथ) तथा बोकारो के लुगू बुरू को संथाल आदिवासियों के पवित्र धार्मिक स्थलों के रूप में अधिसूचित कर संरक्षित किया जाए तथा इनके संरक्षण और प्रबंधन की जिम्मेदारी स्थानीय ग्राम सभाओं को सौंपी जाए। संगठन ने आदिवासी सरना धर्म कोड को लागू करने, अनुसूचित क्षेत्रों के बाहर रहने वाले आदिवासियों को भी पेसा कानून का लाभ देने, संथाली भाषा को झारखंड की राजकीय भाषा घोषित करने तथा ओलचिकी लिपि में शिक्षा व्यवस्था और शिक्षकों की नियुक्ति सुनिश्चित करने की मांग उठाई। साथ ही संथाली अकादमी के गठन और भाषा-संस्कृति के संरक्षण के लिए विशेष पहल करने का प्रस्ताव भी पारित किया गया।

सभा में आदिवासी भूमि अधिकारों की रक्षा, सीएनटी और एसपीटी कानूनों के सख्त पालन, वनाधिकार कानून के तहत भूमि पट्टा वितरण, जाहेरथान एवं सरना स्थलों की घेराबंदी, प्रत्येक संथाल गांव में सामुदायिक भवन (माँझी हाउस) निर्माण तथा आदिवासी गांवों के समग्र विकास की मांग भी की गई। विस्थापन को संथाल समाज के लिए गंभीर संकट बताते हुए विस्थापन अधिकार आयोग के गठन, भूमि के बदले भूमि देने, उचित पुनर्वास और पुनर्स्थापन सुनिश्चित करने तथा जिला खनिज फाउंडेशन (DMF) की राशि का उपयोग सीधे प्रभावित एवं विस्थापित परिवारों के हित में करने की मांग की गई।

इसके अलावा रजरप्पा को संथालों के धार्मिक स्थल के रूप में अतिक्रमण मुक्त कराने, आदिवासी आरक्षित सीटों में कटौती नहीं करने तथा 9 अगस्त विश्व आदिवासी दिवस को राष्ट्रीय स्तर पर राजकीय महोत्सव और सार्वजनिक अवकाश घोषित करने की भी मांग की गई। संथाल समाज दिशोम माँझी परगना के महासचिव सोनाराम माँझी ने कहा कि पारित प्रस्तावों को सरकार तक पहुंचाया जाएगा और आदिवासी समाज के अधिकारों एवं विकास के लिए संगठन निरंतर संघर्ष करता रहेगा।


 

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