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मुख्य सचिव प्रोजेक्ट भवन में पत्रकारों के प्रवेश पर लगायी रोक हटाएंः रांची प्रेस क्लब

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द फॉलोअप, रांची
 रांची प्रेस क्लब ने प्रोजेक्ट भवन मुख्य सचिवालय में पत्रकारों के प्रवेश पर लगायी रोक पर गहरी नाराजगी जतायी है। प्रेस क्लब की ओर से जारी बयान में का गया है कि आज, 9 जुलाई 2026 को प्रोजेक्ट भवन में अपने नियमित पेशेवर दायित्वों के निर्वहन के लिए पहुंचे पत्रकारों को सुरक्षा कर्मियों ने प्रवेश से रोक दिया। मौके पर मौजूद सुरक्षा अधिकारियों ने बताया कि उन्हें ‘ऊपर से मिले निर्देश’ के तहत पत्रकारों के प्रवेश पर रोक लगाने को कहा गया है। पत्रकारों से कहा गया कि यदि उन्हें प्रोजेक्ट भवन में प्रवेश करना है, तो संबंधित अधिकारी या कर्मचारी अपने स्तर से फोन कर अनुमति दिलाए, तभी उन्हें अंदर जाने दिया जाएगा। इस घटनाक्रम से पत्रकारों के बीच गहरा असंतोष है। सचिवालय में पत्रकारों के प्रवेश पर रोक संबंधी इस मौखिक निर्देश का रांची प्रेस क्लब कड़ा विरोध करता है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में सचिवालय तक पत्रकारों की पहुंच इस प्रकार बाधित करना न केवल दुर्भाग्यपूर्ण है, बल्कि प्रेस की स्वतंत्रता और जनता के सूचना के अधिकार की भावना के भी प्रतिकूल है।


प्रेस क्लब राज्य सरकार और मुख्य सचिव से मांग करता है कि पत्रकारों के प्रवेश पर लागू की गई इस व्यवस्था को तत्काल वापस लिया जाए तथा पूर्व की भांति पत्रकारों को प्रोजेक्ट भवन में निर्बाध प्रवेश की अनुमति दी जाए। स्वतंत्र, निष्पक्ष और निर्भीक पत्रकारिता लोकतंत्र की आधारशिला है। उसे प्रशासनिक आदेशों या मौखिक निर्देशों के माध्यम से सीमित करने का कोई भी प्रयास केवल पत्रकारों के अधिकारों का प्रश्न नहीं है, बल्कि जनता के सूचना के अधिकार से भी जुड़ा विषय है। रांची प्रेस क्लब इस मुद्दे पर पत्रकारों के साथ मजबूती से खड़ा है और आवश्यकता पड़ने पर पत्रकार हितों की रक्षा के लिए लोकतांत्रिक तरीके से आगे की कार्रवाई करने के लिए बाध्य होगा।

पत्रकार किसी एक अधिकारी या कर्मचारी से मिलने नहीं जाते, बल्कि विभिन्न विभागों से तथ्य जुटाने और जनहित से जुड़े विषयों की रिपोर्टिंग करने जाते हैं। ऐसे में किसी अधिकारी के फोन पर प्रवेश की शर्त न केवल अव्यावहारिक है, बल्कि स्वतंत्र पत्रकारिता की मूल भावना के भी विपरीत है। इस अघोषित प्रतिबंध से न केवल पत्रकारों का कार्य प्रभावित होगा, बल्कि सरकार की विकासात्मक गतिविधियों और नीतिगत निर्णयों से संबंधित प्रामाणिक सूचनाओं के प्रवाह पर भी प्रतिकूल असर पड़ेगा। परिणामस्वरूप अपुष्ट और भ्रामक सूचनाओं के प्रसार की आशंका बढ़ेगी, जो किसी भी सरकार और लोकतांत्रिक व्यवस्था के हित में नहीं है।


 

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