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कांग्रेस नेता आलोक दूबे ने आम बजट को बताया दिशाहीन, कहा- झूठे वादों और खोखले दावों का दस्तावेज़ है ये दस्तावेज  2026

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रांची 
केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा पेश किए गए बजट 2026–27 पर झारखंड प्रदेश कांग्रेस कमेटी के महासचिव आलोक कुमार दुबे ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने इस बजट को झूठे वादों और खोखले दावों का दस्तावेज़ बताते हुए कहा कि यह बजट नीतिहीन, नीयतविहीन और समाधानविहीन है।
आलोक कुमार दुबे ने कहा कि बजट पेश होते ही शेयर बाजार में आई भारी गिरावट यह दर्शाती है कि अब निवेशकों का भी मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों पर भरोसा डगमगा चुका है। यह बजट देश की वास्तविक आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक चुनौतियों से आंख मूंदे हुए है।
उन्होंने कहा कि आज देश में बेरोजगारी चरम पर है, मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर ध्वस्त हो चुका है, निवेशक पूंजी बाहर ले जा रहे हैं और घरेलू बचत लगातार गिर रही है। किसान गहरे संकट में हैं, लेकिन बजट में इन मुद्दों पर कोई ठोस समाधान नहीं दिया गया है। वैश्विक आर्थिक झटकों की अनदेखी करना सरकार की गंभीर विफलता को दर्शाता है।


आलोक कुमार दुबे ने आरोप लगाया कि यह बजट आम जनता की जेब काटने और कॉर्पोरेट मित्रों को टैक्स हॉलिडे देने वाला है। झारखंड जैसे पिछड़े राज्य के लिए इसमें कुछ भी नया नहीं है—न विशेष राज्य का दर्जा, न कोई बड़ा औद्योगिक पैकेज।
उन्होंने कहा कि युवाओं के रोजगार, महिलाओं की भागीदारी और एमएसएमई सेक्टर के लिए सरकार के पास कोई ठोस योजना नहीं है। 10 हजार करोड़ की एसएमई निधि को उन्होंने “ऊंट के मुंह में जीरा” बताते हुए कहा कि झारखंड के लाखों उद्यमी बिजली और कच्चे माल की समस्याओं से जूझ रहे हैं, लेकिन बजट में उनके लिए कोई राहत नहीं है।


कांग्रेस महासचिव ने कहा कि विदेशी यात्रा पैकेज पर टैक्स में छूट अमीरों को फायदा पहुंचाने वाली है, जबकि मध्यम वर्ग को आयकर में बड़ी राहत की उम्मीद थी। नया आयकर कानून लाकर सरकार ने केवल उलझन बढ़ाने का काम किया है।
राज्य सरकारों की वित्तीय स्थिति पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि वित्त आयोग की सिफारिशें राज्यों को कोई वास्तविक राहत नहीं देतीं, जिससे संघीय ढांचे पर दबाव बढ़ेगा। सामाजिक सुरक्षा, ग्रामीण रोजगार, निर्यात, व्यापार घाटा और गिरती मुद्रा जैसे अहम मुद्दों पर बजट पूरी तरह मौन है। आलोक कुमार दुबे ने कहा कि यह बजट न तो जनता की समस्याओं का समाधान करता है और न ही देश को भविष्य की कोई स्पष्ट दिशा देता है। उन्होंने कहा, “यहां तक कि नारे भी इतने मजबूत नहीं हैं कि नीतिगत शून्यता को ढक सकें।”


 

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