जीतेंद्र कुमारः
झारखंड में आदिवासी, ओबीसी वोट बैंक को साधने से कहीं अधिक अब दलित वोट बैंक को पक्ष में करने की रणनीति दिखायी पड़ने लगी है। कांग्रेस के बाद झामुमो और अब भाजपा ने दलित कार्ड खेल कर यही संकेत दिया है। राज्य की प्रमुख पार्टियां यह मान कर चल रही है कि दलितों का वोट बैंक अपने पक्ष में करना चुनावी रणनीति के दृष्टिकोण से ज्यादा महत्वपूर्ण है। इस वोट बैंक को एकमुश्त सहेजा भी जा सकता है। जबकि आदिवासी और ओबीसी वोट बैंक को थोक में समेटना ज्यादा मुश्किल है। यही कारण है कि पहले कांग्रेस ने झारखंड में दलित कार्ड खेला। छतरपुर से विधायक राधाकृष्ण किशोर को मंत्री बना कर इस समुदाय के बीच सकारात्मक संदेश देने का काम किया। किशोर ने दलितों की समस्याओं और हितों को प्रमुखता से उठाने का काम भी करते जा रहे हैं। उन्होंने मुख्यमंत्री को पत्र लिख कर एससी आयोग को फंक्शनल बनाने की मांग की तो कई मौकों पर इस समुदाय के हितों को आवाज भी दी। चुनावी राजनीति में इसका एक ही उद्देश्य, संबंधित समुदाय के वोट बैंक को अपनी ओर खींचना होता है।
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कांग्रेस के दलित प्रेम को देखते हुए झामुमो भी पीछे नहीं रहा है। राज्यसभा के पिछले चुनाव में झामुमो ने ब्रजमोहन राम को पार्टी टिकट पर राज्यसभा भेजा। इसकी खूब चर्चा भी हुई। झामुमो के इस दलित कार्ड को पार्टी के नजरिए से मुख्यमंत्री सह झामुमो के केंद्रीय अध्यक्ष हेमंत सोरेन के निर्णय को सराहा भी गया। कई तरह के तर्क भी दिए गए। पलामू प्रमंडल में झामुमो दूसरे प्रमंडलों की अपेक्षा कमजोर रहा है। बैजनाथ राम को राज्यसभा भेज कर इस प्रमंडल में झामुमो दलितों के सहारे अपने को मजबूत करने की कोशिश की है। बताने की जरूरत नहीं कि झारखंड में सबसे अधिक दलितों की संख्या पलामू में ही है। इसी आधार पर डालटेनगंज लोकसभा सीट एससी के लिए सुरक्षित भी है। इस प्रमंडल में विधानसभा के कुल 7 सीटें हैं। इनमें एक भी झामुमो के पास नहीं है।

पिछले कुछ महीनों से कांग्रेस और झामुमो के दलित प्रेम को देख भाजपा परेशान थी । वह भी झामुमो के दलित कार्ड को काटने पर गंभीरता से विचार कर रही थी। इसी कार्ड के तहत भाजपा ने झामुमो के बैजनाथ राम रूपी नहले पर ब्रजमोहन राम रूपी दहला चलने का काम किया है। क्योंकि चुनावी राजनीति में किसी समुदाय को अपनी ओर खींचने के लि उसके प्रति सहानुभूति और उसे महत्व देने की चाल चलनी पड़ती है। उस समुदाय के नेता को सरकार और संगठन में प्रमुखता देकर यह सदृश्यता दिखानी पड़ती है। भाजपा ने पलामू के पूर्व सांसद ब्रजमोहन राम को उड़ीसा का राज्यपाल बना कर झारखंड की राजनति में यही काम किया है। यह सच भी है कि ब्रजमोहन राम के राज्यपाल बनने से इस समुदाय के बीच भाजपा के प्रति पॉजिटिव संदेश गया भी है।

एससी चेहरे को महत्व देने के पीछे क्या है कारण
झारखंड में एसटी के लिए कुल 28 सीटें हैं। 2024 के विधानसभा चुनाव में इन 28 सीटों में सरायकेला की एक मात्र सीट भाजपा के खाते में आयी। वह भी चंपाई सोरेन के रूप में जो झामुमो से आए थे। लगभग यही स्थिति एससी सीटों पर भी रही। एससी के लिए रिजर्व 9 सीटों में भाजपा के खाते में मात्र तीन सीटें हैं। सिमरिया से उज्ज्वल दास, जमुआ से मंजू कुमारी और लातेहार से प्रकाश राम। एससी की 6 सीटें भाजपा के कब्जे से बाहर है। जबकि 2019 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के खाते में छह सीटें आयी थी। यह सबसे बड़ा कारण है कि भाजपा को ब्रजमोहन राम रूपी चेहरे को महत्व देना पड़ा है।
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