रामगढ़:
रामगढ़ के अरगड्डा इलाके में अवैध कोयला खनन के दौरान 4 मजदूरों की मौत हो गई। रविवार को नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने मृतकों के परिजनों से मुलाकात की। बाबूलाल मरांडी ने मृत मजदूरों के आश्रितों को आश्वासन दिया है कि उनकी हरसंभव सहायता की जाएगी। उन्होंने मृतक देवा बेदिया, डबलू बेदिया, किशोर रवानी और आशीष घटवार के घरवालों का ढांढ़स बंधाया। बाबूलाल मरांडी ने मजदूरों की आकस्मिक मौत को चिंताजनक बताते हुए कहा कि ये लोग काफी गरीब हैं। देवा और डबलू तो चाचा-भतीजे हैं। दुर्घटना में जान गंवाने वाले आशीष घटवार की पत्नी गर्भवती है। डब्लू बेदिया पत्नी और बच्ची को पीछे छोड़ गया। इस घटना में मारे गए देवा बेदिया और किशोर रवानी अवविवाहित हैं। परिजनों ने सीसीएल प्रबंधन से मांगा 10-10 लाख रुपये का मुआवजा।

रामगढ़ जिला प्रशासन पर गंभीर सवाल
बाबूलाल मरांडी ने कहा कि रामगढ़ में बंद पड़ी खदान में एक व्यक्ति गिरता है और उसे बचाने गए बाकी 3 लोग भी अपनी जान गंवा बैठते हैं। उन्होंने इसे केवल हादसा कहने की जगह प्रशासनिक लापरवाही, भ्रष्ट तंत्र और संवेदनहीन व्यवस्था द्वारा किया गया नरसंहार बताया। नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि जब बंद खदानों की घेराबंदी करना, सुरक्षा सुनिश्चित करना और लोगों की आवाजाही रोकना जिला प्रशासन और सीसीएल की सीधी जिम्मेदारी है, तो फिर सवाल उठता है कि आखिर रामगढ़ के डीसी, एसपी और सीसीएल प्रबंधन किस बात की तनख्वाह और सुविधा ले रहे हैं? क्या उनकी भूमिका सिर्फ़ हादसों के बाद औपचारिक बयान जारी करने तक सीमित रह गई है?
बाबूलाल मरांडी ने कहा कि झारखंड में अवैध खनन के कारोबार में दलाल, बिचौलिया, पुलिस-प्रशासन और वन विभाग की मिलीभगत है।

रेस्क्यू के नाम पर 5 हजार वसूलने का आरोप
बाबूलाल मरांडी ने कहा कि हादसे के बाद जो बातें सामने आ रही हैं, वे तो इंसानियत को भी शर्मसार कर देने वाली हैं। आरोप है कि रेस्क्यू के नाम पर 5 हजार रुपये वसूले गए, गंभीर हालत में लोगों को बेहतर अस्पताल भेजने के बजाय सीधे सदर अस्पताल ले जाकर पोस्टमार्टम की तैयारी शुरू कर दी गई। अगर यह सच है, तो यह सिर्फ़ लापरवाही नहीं बल्कि गरीबों की मौत पर भी वसूली करने वाली निर्लज्ज व्यवस्था का वीभत्स चेहरा है।
अवैध खनन में धनबाद के बराबर है रामगढ़
उन्होंने कहा कि वैसे भी रामगढ़ अब कोयला चोरी, अवैध कारोबार और पुलिस संरक्षण के मामलों में धनबाद से पीछे नहीं रहा। पीछे रहे भी कैसे? जब सत्ता के गलियारों में “बोली” लगाकर पोस्टिंग तय होती हो, तो फिर जनता की सुरक्षा नहीं बल्कि “हफ्ता वसूली” ही प्राथमिकता बन जाती है। ऊपर से नीचे तक सेटिंग और हिस्सेदारी का खेल चलता रहे, इसलिए खदानें मौत का कुआं बनी रहे... शायद यही मॉडल बना दिया गया है।
बाबूलाल मरांडी ने मामले की उच्चस्तरीय जांच, दोषियों पर निलंबन की कार्रवाई की जगह हत्या की धाराओं में मुकदमा दर्ज करने, पीड़ित परिवारों को सम्मानजनक मुआवजा और सरकारी नौकरी देने की मांग की है।