द फॉलोअप डेस्क
पेसा नियमावली और नगर निकाय चुनाव की तरह लंबित सूचना आयुक्तों की नियुक्ति का मामला अब निदान के पायदान पर पहुंच गया है। पिछले दिनों झारखंड हाईकोर्ट में जस्टिस सुजीत नारायण की खंड पीठ ने राज्य सरकार को कड़ी फटकार लगायी है। साथ ही अदालत ने 29 जनवरी को राज्य के मुख्य सचिव अविनाश कुमार और कार्मिक एवं प्रशासनिक सुधार विभाग के सचिव प्रवीण टोप्पो को सशरीर अदालत में उपस्थित होने का फरमान जारी किया है। अदालत ने कहा है कि उस दिन मुख्य सचिव फ्रेम वर्क दें कि राज्य सूचना आयोग कब तक फंक्शनल हो जाएगा। इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट में भी पिछले दिनों सूचना आयुक्तों की नियुक्ति को लेकर दायर याचिका(1461-2021) पर सुनवाई हुई। सुप्रीम कोर्ट ने भी झारखंड सरकार को नौ फरवरी को अदालत में कंप्लायंस रिपोर्ट दाखिल करने का आदेश दिया है। इस तरह अब राज्य सरकार के लिए सूचना आयुक्तों की नियुक्ति को टालते जाना, बहुत आसान नहीं बताया जा रहा है। मामला वहां पहुंच गया है जहां अब सरकार के लिए बहाना बनाना मुश्किल होने वाला है।

मालूम हो कि पेसा नियमावली को लागू करने और राज्य में नगर निकायों के चुनाव का मामला भी वर्षों तक टलता रहा। लेकिन जब हाईकोर्ट ने मुख्य सचिव और विभागीय सचिवों को बार बार अदालत में सशरीर उपस्थित होकर कारण बताने का निर्देश दिया, टाइम फ्रेम तय करने का आदेश दिया तो सरकार ने बाध्य होकर पेसा नियमावली को भी अधिसूचित किया और नगर निकाय चुनाव कराने की दिशा में आगे बढ़ी है। उम्मीद की जा रही है कि कुछ दिनों में राज्य निर्वाचन आयोग किसी भी समय निकाय चुनाव की घोषणा कर सकता है। यहां मालूम हो कि वर्ष 2020 से ही राज्य सूचना आयोग में मुख्य सूचना आयुक्त और फिर अन्य सूचना आयुक्तों के पद रिक्त हैं। पहले प्रतिपक्ष का नेता नहीं होने के कारण नियुक्ति की प्रक्रिया बाधित रही, अब बाबूलाल मरांडी के प्रतिपक्ष के नेता पद पर नियुक्ति के बाद भी मामला लंबित है। सूचना आयुक्त, मानवाधिकार आयोग, लोकायुक्त समेत कई अन्य संवैधानिक पद रिक्त हैं।
