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2 अगस्त को होगा आदिवासी महाजुटान, परिसीमन के खिलाफ रांची में जुटेगा पूरा समाज : बंधु तिर्की

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द फॉलोअप डेस्क

देशभर में परिसीमन को लेकर चल रही चर्चाओं के बीच झारखंड में आदिवासी समुदाय की चिंता बढ़ गई है। समुदाय को आशंका है कि नई परिसीमन प्रक्रिया में आदिवासी बहुल सीटों की संख्या घट सकती है, जिससे उनके राजनीतिक प्रतिनिधित्व और संवैधानिक अधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

इसी मुद्दे पर रविवार को रांची प्रेस क्लब में पूर्व मंत्री बंधू तिर्की की पहल पर एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई। बैठक में आदिवासी समाज से जुड़े बुद्धिजीवियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और विभिन्न संगठनों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। परिसीमन से आदिवासी समाज पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों और उसके समाधान को लेकर विस्तृत चर्चा की गई। बैठक में मौजूद आदिवासी अगुआओं ने अपने-अपने सुझाव भी रखे।

2 अगस्त को रांची में आदिवासी समाज का महाजुटान 
बैठक के बाद मीडिया से बातचीत करते हुए बंधू तिर्की ने कहा कि परिसीमन के मुद्दे पर लंबी चर्चा के दौरान कई महत्वपूर्ण सुझाव सामने आए हैं। इन सुझावों के आधार पर आगे की रणनीति तैयार की जाएगी। उन्होंने बताया कि सबसे पहले इस विषय पर राज्य की सभी राजनीतिक पार्टियों को साथ लेकर व्यापक चर्चा की जाएगी। इसके लिए 17 जून को एक बैठक बुलाई गई है, जिसमें झारखंड मुक्ति मोर्चा, कांग्रेस समेत भारतीय जनता पार्टी को भी शामिल करने का प्रयास किया जाएगा। बंधू तिर्की ने घोषणा की कि परिसीमन के खिलाफ आदिवासी समाज का महाजुटान 2 अगस्त को रांची में आयोजित किया जाएगा। इस महाजुटान में राज्यभर से आदिवासी समुदाय के लोग शामिल होंगे और अपनी एकजुटता का प्रदर्शन करेंगे।

जनसंख्या आधारित परिसीमन से आदिवासी राजनीतिक प्रतिनिधित्व घटने की आशंका

बैठक में वक्ताओं ने कहा कि परिसीमन केवल सीटों के पुनर्गठन का विषय नहीं है, बल्कि यह आदिवासी समाज के राजनीतिक अस्तित्व, संवैधानिक अधिकारों और लोकतांत्रिक भागीदारी से जुड़ा हुआ महत्वपूर्ण मुद्दा है। उनका कहना था कि रोजगार और अन्य कारणों से बड़ी संख्या में आदिवासी समुदाय के लोग पलायन करने को मजबूर हुए हैं, जबकि गैर-आदिवासी आबादी में तेजी से वृद्धि हुई है। इससे कई आदिवासी क्षेत्रों की जनसंख्या संरचना में बदलाव आया है।

वक्ताओं ने चिंता जताई कि यदि केवल जनसंख्या को आधार बनाकर आदिवासी आरक्षित सीटों की संख्या घटाई जाती है, तो यह संविधान की मूल भावना और सामाजिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत होगा। आदिवासी समाज इसे केवल सीटों की कटौती नहीं, बल्कि अपने राजनीतिक अस्तित्व और संवैधानिक अधिकारों पर सीधा प्रभाव मानता है।

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