द फॉलोअप डेस्क
25 जून 1975 की रात भारत के लोकतंत्र में एक ऐसा दौर शुरू हुआ जिसे आज भी इतिहासकार और राजनैतिक विश्लेषक देश के सबसे काले अध्याय के रूप में याद करते हैं। इसी दिन तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत देशभर में आपातकाल लगाने की घोषणा की। यह निर्णय तब लिया गया जब उन पर राजनीतिक और न्यायिक दबाव एक साथ बढ़ने लगा था। दरअसल, 12 जून 1975 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इंदिरा गांधी को रायबरेली सीट से 1971 का लोकसभा चुनाव जीतने को अवैध करार देते हुए उनका चुनाव रद्द कर दिया। इसके साथ ही उन्हें 6 साल तक किसी भी प्रकार का चुनाव लड़ने के अयोग्य ठहराया गया। इस फैसले से देश की राजनीति में भूचाल आ गया।
इसी बीच समाजवादी नेता जयप्रकाश नारायण (जेपी) ने इंदिरा गांधी के इस्तीफे की मांग को लेकर जन आंदोलन छेड़ दिया। 25 जून की शाम दिल्ली के रामलीला मैदान में लाखों लोगों की सभा को संबोधित करते हुए जेपी ने यहां तक कह दिया कि सरकारी कर्मचारी, पुलिस और सेना संविधानविरोधी आदेशों को न मानें। इस भाषण को इंदिरा गांधी ने देश की सुरक्षा और एकता के लिए खतरा मानते हुए उसी रात राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद के पास आपातकाल लगाने की सिफारिश भेज दी, जिसे तुरंत मंजूरी दे दी गई। इसके बाद रातों-रात पूरे देश में आपातकाल लागू कर दिया गया और संविधान के तहत नागरिकों के मौलिक अधिकार निलंबित कर दिए गए।
आपातकाल लागू होते ही देश में अंधकार फैल गया। हजारों की संख्या में विपक्षी नेताओं को बिना किसी वारंट या मुकदमे के गिरफ्तार कर लिया गया। जेलों में जेपी, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, मोरारजी देसाई और जॉर्ज फर्नांडिस जैसे दिग्गज नेता बंद कर दिए गए। प्रेस की आजादी पूरी तरह खत्म कर दी गई और अखबारों को सरकारी मंजूरी के बिना छापने की अनुमति नहीं थी। रेडियो और दूरदर्शन जैसे सरकारी माध्यमों को पूरी तरह सरकारी प्रचार का औजार बना दिया गया।
आपातकाल की अवधि करीब 21 महीने तक चली। इस दौरान इंदिरा गांधी सरकार ने संविधान में 42वां संशोधन कर केंद्र को और अधिक शक्तिशाली बना दिया। लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गया, जन आक्रोश बढ़ता गया। अंततः 21 मार्च 1977 को आपातकाल हटा लिया गया और देश में आम चुनाव कराए गए। जनता ने इंदिरा गांधी को उनकी इस कार्रवाई का करारा जवाब दिया और उन्हें सत्ता से बाहर कर दिया। मोरारजी देसाई के नेतृत्व में जनता पार्टी की सरकार बनी और देश में लोकतंत्र फिर से बहाल हुआ।
25 जून 1975 का दिन भारत के इतिहास में हमेशा के लिए दर्ज हो गया। यह वह दिन था जब एक लोकतांत्रिक देश में अपने ही संविधान का प्रयोग करके उसकी आत्मा को कुचल दिया गया। यह घटना आज भी हमें चेतावनी देती है कि लोकतंत्र केवल चुनाव से नहीं चलता, बल्कि उसमें नागरिकों की स्वतंत्रता, प्रेस की आज़ादी और न्यायपालिका की निष्पक्षता आवश्यक है।
