हजारीबाग
Hazaribagh News: नवरात्रि (Navratri) में मां दुर्गा के दरबार में भक्त सुख, समृद्धि और परिवार की खुशहाली की कामना कर रहे हैं। वहीं, हजारीबाग (Hazaribagh) में एक मां की प्रार्थना सिर्फ इतनी है कि उसे उसका बेटा मिल जाए। रामगढ़ (Ramgarh) जिले के दिगवार की रहने वाली प्रियंका कुमारी (Priyanka Kumari) पिछले चार साल से अपने बेटे से दूर हैं। बेटे से बिछड़ने के दर्द के बीच प्रियंका अब होमगार्ड (Home Guard) बनने की तैयारी कर रही हैं। उनके लिए यह सिर्फ नौकरी पाने की कोशिश नहीं, बल्कि अपनी जिंदगी को बेहतर बनाने और बेटे से दोबारा मिलने की उम्मीद से जुड़ा संघर्ष (Struggle) भी है।

चार साल से बेटे से दूर हैं प्रियंका, तीन साल का था बच्चा
प्रियंका कुमारी की शादी को आठ साल हो चुके हैं। हालांकि, पति-पत्नी के बीच विवाद के कारण उनका वैवाहिक जीवन मुश्किल दौर से गुजर रहा है। फिलहाल प्रियंका हजारीबाग जिले के इचाक स्थित अपने मायके में रह रही हैं। प्रियंका का आरोप है कि चार साल पहले उनके पति ने उन्हें घर से निकाल दिया और बेटे को अपने पास रख लिया। उस समय उनका बेटा महज तीन साल का था। आज वह सात साल का हो चुका है। चार साल का यह अंतराल प्रियंका के लिए बेहद पीड़ादायक है। जिस बच्चे को उन्होंने नौ महीने अपनी कोख में रखा, गोद में खिलाया और जिसके साथ भविष्य के अनगिनत सपने देखे, उसी बच्चे से मिलने के लिए वह तरस रही हैं। उन्हें यह भी नहीं पता कि उनका बेटा अब कैसा दिखता है, उसकी आवाज कितनी बदल गई है और वह अपनी मां को याद करता है या नहीं।
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बेटे से मिलने की उम्मीद में होमगार्ड बनने की तैयारी
प्रियंका को उम्मीद है कि अगर वह होमगार्ड बन जाती हैं, तो उनके जीवन में बदलाव आ सकता है। उनका मानना है कि नौकरी मिलने से वह आत्मनिर्भर बन सकेंगी और शायद उनके पारिवारिक जीवन की परिस्थितियां भी बदलें। उन्हें उम्मीद है कि एक दिन वह अपने बेटे के करीब पहुंच सकेंगी। इसी उम्मीद के साथ प्रियंका हर दिन मेहनत कर रही हैं। उनके लिए होमगार्ड की भर्ती की तैयारी केवल शारीरिक परीक्षा पास करने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अपने पैरों पर खड़े होने और जिंदगी को नई दिशा देने का प्रयास भी है।
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साड़ी और नंगे पैर कोलंबस ग्राउंड पहुंची थीं प्रियंका
कुछ दिनों पहले हजारीबाग के कोलंबस ग्राउंड में सुबह-सुबह एक महिला साड़ी पहने और नंगे पैर दौड़ती नजर आईं। उनके पैरों में जूते नहीं थे और न ही शरीर पर ट्रैक सूट था। इसके बावजूद वह पूरे हौसले के साथ दौड़ने का अभ्यास कर रही थीं। यह महिला कोई और नहीं, बल्कि प्रियंका कुमारी थीं। प्रियंका इचाक से करीब 15 किलोमीटर की दूरी तय करके मैदान पहुंची थीं। उनके सामने आर्थिक और व्यक्तिगत परेशानियां थीं, लेकिन उन्होंने अपनी तैयारी को रुकने नहीं दिया। उनके संघर्ष की कहानी यह बताती है कि मुश्किल हालात के बावजूद इंसान अपने लक्ष्य की ओर कदम बढ़ा सकता है।
अकादमी के राहुल यादव ने बढ़ाया मदद का हाथ
प्रियंका की मेहनत और उनकी पारिवारिक परिस्थितियों के बारे में जानने के बाद अकादमी के राहुल यादव ने उनकी मदद के लिए हाथ बढ़ाया। उन्होंने प्रियंका को ट्रैक सूट और जूते उपलब्ध कराए। साथ ही, उन्हें निःशुल्क प्रशिक्षण देना भी शुरू किया। अब प्रियंका हर सुबह कोलंबस ग्राउंड पहुंचती हैं और नियमित रूप से दौड़, लॉन्ग जंप और हाई जंप का अभ्यास करती हैं। प्रशिक्षण के दौरान शारीरिक थकान और दूसरी चुनौतियां उनके सामने आती हैं, लेकिन वह अपने लक्ष्य को हासिल करने की कोशिश में जुटी हैं। राहुल यादव की मदद से अब उनके पास अभ्यास के लिए जरूरी सामान भी है। हालांकि, उनके संघर्ष की सबसे बड़ी वजह आज भी वही है—अपने जीवन को बेहतर बनाना और बेटे से मिलने की उम्मीद को जिंदा रखना।
बेटे का जिक्र आते ही छलक पड़े प्रियंका के आंसू
द फॉलो UP से बातचीत के दौरान प्रियंका अपने दर्द को संभाल नहीं सकीं। बेटे से चार साल तक दूर रहने की बात सामने आते ही उनकी आंखें भर आईं। बेटे को याद करते हुए वह भावुक हो गईं और उनके आंसुओं ने उनके भीतर छिपे दर्द को बयां कर दिया।
एक मां के लिए बच्चे से बिछड़ना केवल दूरी का मामला नहीं होता। बच्चे के बचपन के कई अहम पल उसकी आंखों के सामने नहीं गुजर पाते। उसकी छोटी-छोटी बातें, बदलती आदतें, स्कूल के अनुभव और उसके बड़े होने के कई पड़ाव मां से दूर बीत जाते हैं। प्रियंका भी इसी पीड़ा से गुजर रही हैं। उनकी सबसे बड़ी ख्वाहिश है कि वह एक बार अपने बेटे को सामने से देख सकें, उसे गले लगा सकें और उसके साथ कुछ पल बिता सकें। हालांकि, वह अपने बेटे से कब मिल पाएंगी, यह फिलहाल स्पष्ट नहीं है।
वैवाहिक विवाद का समाधान कानूनी प्रक्रिया से ही संभव
प्रियंका और उनके पति के बीच विवाद का भविष्य क्या होगा, यह अभी तय नहीं है। इसी तरह, होमगार्ड की नौकरी में उनका चयन होगा या नहीं, इसे लेकर भी अभी कुछ कहना संभव नहीं है। लेकिन प्रियंका अपनी ओर से मेहनत कर रही हैं और बेहतर भविष्य की उम्मीद लगाए हुए हैं। ऐसे मामलों में वैवाहिक विवाद का समाधान कानून और न्यायिक प्रक्रिया के तहत होना चाहिए। साथ ही, बच्चे के सर्वोत्तम हित और मां-बच्चे के रिश्ते की संवेदनशीलता को भी महत्व दिया जाना जरूरी है। प्रियंका की कहानी किसी पक्ष के खिलाफ फैसला सुनाने के बजाय उस भावनात्मक पीड़ा को सामने लाती है, जिसका सामना बच्चे से अलग रह रही एक मां कर रही है।
रामगढ़ की कविता महतो की कहानी भी आई थी सामने
द फॉलो UP इससे पहले रामगढ़ की कविता महतो की कहानी भी सामने ला चुका है। पति के निधन के बाद कविता पर अपने दो छोटे बच्चों और बुजुर्ग सास-ससुर की जिम्मेदारी आ गई थी। आर्थिक परेशानियों के बीच वह तपती धूप में साड़ी पहनकर और नंगे पैर दौड़ने पहुंची थीं। उनके पास जूते और ट्रैक सूट खरीदने तक के पैसे नहीं थे, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। अब प्रियंका कुमारी की कहानी भी संघर्ष और उम्मीद की ऐसी ही तस्वीर पेश कर रही है। फर्क इतना है कि प्रियंका के पास अब जूते और ट्रैक सूट हैं, सामने होमगार्ड बनने का लक्ष्य है, लेकिन दिल में एक अधूरी ख्वाहिश आज भी बाकी है।
नवरात्रि में प्रियंका की प्रार्थना है बेटे से मिलना
नवरात्रि में जब लोग मां दुर्गा से शक्ति और सुख-समृद्धि मांग रहे हैं, तब प्रियंका भी अपने जीवन में बदलाव की उम्मीद कर रही हैं। उनकी प्रार्थना किसी बड़ी संपत्ति, गहने या ऐशो-आराम के लिए नहीं, बल्कि अपने बेटे को दोबारा देखने और उसे सीने से लगाने के लिए है। हर सुबह कोलंबस ग्राउंड में उनकी दौड़ उनके संघर्ष की कहानी कहती है। वह दौड़ती हैं, अभ्यास करती हैं और अपने सपने को पूरा करने की कोशिश करती हैं। उन्हें उम्मीद है कि एक दिन परिस्थितियां बदलेंगी और वह अपने बेटे के साथ समय बिता सकेंगी। प्रियंका की कहानी एक मां के दर्द, आत्मनिर्भर बनने की कोशिश और उम्मीद के सहारे आगे बढ़ने की कहानी है। सवाल यह है कि रिश्तों के विवाद के बीच एक मां और बच्चे के भावनात्मक जुड़ाव को कैसे सुरक्षित रखा जाए, ताकि बच्चे के हितों का ध्यान रखते हुए पारिवारिक परिस्थितियों का संवेदनशील और न्यायसंगत समाधान निकाला जा सके।