सूरज ठाकुर:
40 पैसा शुल्क देने पर कोई मर थोड़ी जाओगे। छोटा सा टैक्स है, पहले चुभेगा और फिर आदत लग जाएगी। आदत ही तो लगाना है। टैक्स तो बस बहाना है। नीति आयोग के उपाध्यक्ष अशोक कुमार लाहिड़ी कहते हैं कि चाणक्य ने कहा था कि राज्य चलाने के लिए जनता से वैसे ही टैक्स वसूला जाना चाहिए, जैसे मधुमक्खी फूलों से रस निकालती है। थोड़ा-थोड़ा, ताकि पता ना चले कि वसूला गया है। पता ही नहीं चलेगा कि जेब कहां से कटी तो फिर दुख किस बात का है। गरीब आदमी साबुन से लेकर तेल तक में टैक्स झेल लेता है। उनकी आदत लगी है तो इसकी भी आदत लग जायेगी। हैरानी नहीं होगी कि कल को लाहिड़ी साहब कह दें कि जिस देश की 80 करोड़ जनता मुफ्त का राशन लेती है, वो यूपीआई पेमेंट कहां करेगी कि नुकसान होगा।

खबर तो सुनी होगी आपने। 2000 रुपये से ज्यादा के यूपीआई पेमेंट पर चार्ज लगेगा। सरकार कहती है कि ये व्यापारियों से लेंगे, जनता से नहीं। एक्सपर्ट कहते हैं, जनता और व्यापारी क्या 2 अलग ग्रहों पर रहते हैं। दुकानदार टैक्स चुकाएगा तो वसूलेगा किससे। लागत का भुगतान हमेशा उपभोक्ता करता है, यह तो कॉमन इकोनॉमी है जो कॉमन सेंस से समझ में आ जाती है। जब इसी बाबत नाराजगियों को लेकर सरकार से सवाल किया गया तो नीति आयोग के उपाध्यक्ष अशोक कुमार लाहिड़ी बिफर गये। उन्होंने 2000 रुपये से ज्यादा के यूपीआई पेमेंट पर चार्ज वसूलने के फैसले का पुरजोर समर्थन किया और सरकार के फैसले की मुक्तकंठ से प्रशंसा की।
उनका करना बनता भी है। नीति आयोग के उपाध्यक्ष जो ठहरे। हालांकि, भावनाओं में ऐसा बहे कि कहने लगे 40 पैसा टैक्स देने में मर थोड़ी ना जाओगे। सही कहा साहब। मौजूदा सरकार की नीतियों ने तो जनता को अमरत्व प्रदान किया है, मर थोड़ी जाएंगे। आपकी तमाम कारस्तानियों के बावजूद थाली बजाकर कोरोना महामारी से लड़ गये। बाढ़ में डूबे की सूखे में कुम्हला जाएं, मरते नहीं हैं। कोविड महामारी में हजारों किमी पैदल नाप दिया, कहां मरे। जनता मौत प्रूफ है भारत की। पुल ढहते हैं, इमारतें गिर जाती है, सड़कें बह जाती है, मानसून की बारिश गलियों और नालियों का भेद मिटाती है और जब हमें इनकी आदत लग जाती है तो फिर
यूपीआई पेमेंट में 40 पैसा टैक्स की आदत क्यों नहीं लगेगी। आप बिलकुल ठीक कहते हैं लाहिड़ी जी। हम भारतीय बड़े जीवट हैं। हमें तमाम नाइंसाफियों की आदत लग जाती है। इसकी भी लग जायेगी।
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अशोक कुमार लाहिड़ी कहते हैं कि जनता टैक्स नहीं देंगे तो नेता खाएंगे क्या। ओह सॉरी। टैक्स नहीं देंगे तो सरकार कैसे चलेगी। टैक्स तो देना पड़ेगा। मकान में, दुकान में, प्रतिष्ठान में, सड़क पर, रेस्तरां में, रेल में, जेल में, बेल में, सेल में। सब जगह टैक्स है। विकसित भारत का आधार स्तंभ बनेगा यह टैक्स।
नीति आयोग वाले साहब कहते हैं कि इस तरह के छोटे टैक्स लगाने पड़ते हैं और फिर जनता को इसकी आदत लग जाती है। यहां सही कहा। भारत की जनता को आदत बड़ी जल्दी लग जाती है। रेल के जनरल डिब्बों में भेड़-बकरियों की तरह ठूंसे जाने की आदत लग चुकी है। खटिया पर अस्पताल पहुंचने की आदत लगी है। बिना इलाज दम तोड़ने की आदत लगी है। सड़क पर गड्ढों और ढहती इमारतों की आदत लगी है। प्रतिवर्ष बाढ़ में डूबने की आदत लगी है। सूखे में जान गंवाने की आदत लगी है। आदत ही तो है, लग जाती है। यदि टैक्स का नाम आदत रखा जाये तो गलत नहीं होगा।
हम भारतीयों को आदत बहुत जल्दी लग जाती है। जैसे बाकियों की आदत लगी है, वैसे यूपीआई पेमेंट पर एक्सट्रा चार्ज की भी आदत लग जायेगी। हम भारतीयों को आदतन, आदत लग जाती है।
बिना टैक्स के सरकार कैसे चलेगी। थाली बजाना है। तिरंगा लगाना है। मानव श्रृंखला बनाना है। व्हाट्सएप डीपी सजाना है। जन्मदिवस मनाना है। बिना टैक्स के सरकार ये महत्वपूर्ण काम कैसे करेगी। हां, सड़क, बिजली, पानी, स्वास्थ्य और शिक्षा में आत्मनिर्भर होना है। राष्ट्रवादी जनता इनके लिए सरकार के भरोसे नहीं बैठती। जो जनता 40 पैसा टैक्स देने में मरेगी नहीं, वो मूलभूत सुविधा भी खुद जुटा लेगी।