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Opinion : पटना यूनिवर्सिटी कभी '"ऑक्सफोर्ड ऑफ द ईस्ट" था, आज क्यों खाली रह जा रहीं सीटें?

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व्यंकटेश पांडेय 

पटना विश्वविद्यालय आजकल चर्चा के केंद्र में है, अच्छी शिक्षा, गुणवत्ता पूर्ण प्रशिक्षण और कभी विचार विमर्श का केंद्र कहा जाने वाला ये विश्वविद्यालय अब सेशन लेट, संसाधनों की कमी जैसी कई समस्याओं से जूझ रहा है। कभी ऑक्सफोर्ड कहे जाने वाले इस विश्वविद्यालय से छात्रों का ऐसा मोहभंग हो रहा है कि तीसरी मेरिट लिस्ट आने के बाद भी यहां तकरीबन 1500 से ज्यादा सीटें खाली हैं। कई राजनेताओं के राजनीतिक करियर का कभी सृजनकर्ता रहा, ये विश्वविद्यालय खुद ही राजनीति और जाति के मकड़जाल में फंसता चला जा रहा है। शायद एक वजह ये भी है कि समय के साथ छात्रों की रुचि कम होती चली जा रही है।
विश्वविद्यालय को लगातार डेंट लग रहा
यूनिवर्सिटी का माहौल भी दिन प्रतिदिन बिगड़ता चला जा रहा है और यहां के कैंपस में आए दिन बमबाजी होती है। यानी जो तर्क और विमर्श की पाठशाला थी, वहां देसी बम कैसे पहुंच जाते हैं, ये भी अपने आप में एक सवाल है।
यही वजह है कि लगातार विश्वविद्यालय को डेंट लग रहा है। जिसका असर यह है कि इस साल तो फॉर्म भी कम भरे गए हैं। इस सिलसिले में हमने बात की, पटना विश्वविद्यालय के छात्र संघ के सेकेरेट्री दिव्यम से उन्होंने द फॉलोअप से बात करते हुए बताया कि "कैंपस के अंदर कई स्तर पर कमियां हैं, प्रशासनिक के साथ-साथ यहां संसाधनों की भी कमी है, जिस वजह से छात्र अब दाखिला लेने में दिलचस्पी कम दिखा रहें हैं और साल दर साल एडमिशन के लिए जो फॉम की संख्या है वो कम होती चली जा रही है" 

 देर से चल रहा सेशन
लेकिन बात केवल इतनी भर नहीं है, क्योंकि विश्वविद्यालय का सेशन भी अब समय से नहीं चल रहा। बिहार पहले से ही सेशन लेट के लिए बदनाम है और बिहार में पटना विश्वविद्यालय इकलौता ऐसा संस्थान था, जहां सेशन समय से चलता था और छात्र इस बात पर फख्र भी करते थे कि सेशन लेट नहीं है, लेकिन अब यहां भी वहीं हाल है। जब हम इसकी पड़ताल करने पटना यूनिवर्सिटी पहुंचे तो हमारी मुलाकात पटना विवि छात्र संघ की अध्यक्ष मैथिली मृणालिनी से हुई। उन्होंने बातचीत के दौरान बताया कि "पहले पटना विश्वविद्यालय गौरव का केंद्र हुआ करता था, लोग बड़े फख्र से इस यूनिवर्सिटी का नाम लेते थे, लेकिन पिछले कुछ सालों में ऐसे घटना क्रम हुए हैं, जिसकी वजह से लगातार इसकी छवि खराब हो रही है। विश्वविद्यालय फैकल्टी की कमी से जूझ रहा है, साथ ही यहां संसाधनों की भी कमी है।"
सेंट्रल यूनिवर्सिटी का नहीं मिल रहा दर्जा
जब जिक्र लगातार संसाधनों की कमी का हो रहा था, तो जहन एक बात कौंध गई कि प्रदेश के CM समेत कई और लोग पटना यूनिवर्सिटी को सेंट्रल यूनिवर्सिटी का दर्जा मिल जाए इसके लिए कोशिश कर रहे हैं। नीतीश कुमार ने बाकायदा इस विषय में प्रधानमंत्री मोदी से भी बात की थी। लेकिन अभी तक ये क्यों नहीं मिला ये अपने आप में एक सवाल है। 

इसी बात को जनाने के लिए हमने बात की पटना यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर डॉ अखिलेश कुमार से उन्होंने बातचीत के क्रम में बताया कि अगर सेंट्रल यूनिवर्सिटी का दर्जा मिल जाता है, तो इससे फंड ज्यादा मिलेगा और विश्वविद्यालय का विकास होगा। उन्होंने आगे कहा कि हालांकि इंफ्रास्ट्रक्चर पर काम हो रहा है, लेकिन अगर दर्जा मिल जाता है तो ये काम और तेजी से होगा। साथ ही उन्होंने इस बात का भी जिक्र किया कि छात्र भी कैसे संसाधनों के लिए आवाज उठाते हैं और विश्वविद्यालय में होने वाले चुनाव में भी ये मुद्दा उठाते हैं।  

मतलब कुल मिलाकार हालात जर्जर हैं, जैसे तैसे बस एक कोरम या औपचारिकता पूरी की जा रही, छात्रों के भविष्य की न तो अब किसी को चिंता है, न ही इस ओर कोई ध्यान देना चाह रहा है। हालांकि इन सबसे इतर एक और बात है कि जिस तरह से शिक्षा का निजीकरण हो रहा है और छात्र कोचिंग संस्थानों की चकाचौंध की तरफ भाग रहे हैं और कोचिंग और निजी संस्थानों के शाइनी इश्तहार आकर्षण का केंद्र बनते जा रहे हैं, जिस वजह से आंखों में सपने लिए छात्र उस तरफ खींचे चले जा रहे हैं।

नोट- इस आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं। इनका द फॉलोअप से कुछ लेना-देना नहीं है

 

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