पटना
पटना हाई कोर्ट ने अपील दाखिल करने में 40 दिनों की देरी और गंभीर प्रशासनिक शिथिलता पर कड़ा रुख अपनाते हुए बिहार सरकार पर ₹5000 का अर्थदंड लगाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि समयबद्ध कानूनी कार्रवाई न होना न केवल न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करता है, बल्कि सरकारी तंत्र की कार्यशैली पर भी सवाल खड़े करता है।
न्यायमूर्ति राजीव रंजन प्रसाद और न्यायमूर्ति प्रवीण कुमार की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान पाया कि संबंधित अधिकारियों ने शुरुआती स्तर पर लगभग 72 दिनों तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया। इतना ही नहीं, अपील का मसौदा तैयार होने के बाद भी सक्षम अधिकारी से हलफनामा शपथ के लिए प्रस्तुत कराने में एक माह पांच दिन की अतिरिक्त देरी हुई।
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कोर्ट ने कहा कि सीमावधि जैसे अहम कानूनी पहलुओं के प्रति अधिकारियों की यह लापरवाही बेहद चिंताजनक है। हालांकि, मामला दोषमुक्ति के खिलाफ अपील से जुड़ा होने के कारण अदालत ने ₹5000 की लागत के साथ देरी को माफ कर दिया। यह राशि पटना हाई कोर्ट विधिक सेवा समिति में जमा कराने का निर्देश दिया गया है। इसके साथ ही खंडपीठ ने जिलाधिकारी, पटना को आदेश दिया कि देरी के लिए जिम्मेदार अधिकारियों की पहचान कर उनके खिलाफ विधिसम्मत कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।
अदालत ने भविष्य को लेकर भी सख्त निर्देश जारी करते हुए कहा कि जिला अदालतों के फैसलों में निर्णय अपलोड करने की तिथि अनिवार्य रूप से दर्ज की जाए, ताकि पारदर्शिता बनी रहे। इस दिशा में आवश्यक कदम उठाने के लिए पटना हाई कोर्ट की ई-समिति को भी निर्देश दिए गए हैं।
