द फॉलोअप डेस्क:
Makhana Farming: मिथिला के मखाने (Mithila Makhana) की खेती को जम्मू-कश्मीर तक पहुंचाने की तैयारी है। दरभंगा (Darbhanga) स्थित भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के राष्ट्रीय मखाना अनुसंधान केंद्र और शेर-ए-कश्मीर कृषि विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (University Of Technology) के बीच हुए समझौते के बाद इस दिशा में वैज्ञानिक सहयोग बढ़ाया जा रहा है। इसका उद्देश्य जम्मू-कश्मीर (Jammu- Kashmir) की मिट्टी, पानी और जलवायु के अनुकूल मखाने की खेती की संभावनाओं का पता लगाना है। यदि स्थानीय परिस्थितियों में इसके उत्पादन के अनुकूल नतीजे मिलते हैं, तो वहां के किसानों को फसल विविधीकरण का एक नया विकल्प मिल सकता है।

दरभंगा के वैज्ञानिक देंगे प्रशिक्षण
राष्ट्रीय मखाना अनुसंधान केंद्र, दरभंगा और शेर-ए-कश्मीर कृषि विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के बीच 7 अक्टूबर 2025 को समझौता हुआ था। इसके तहत मखाना, कमल और सिंघाड़ा जैसी जलीय फसलों के उत्पादन, प्रसंस्करण और मूल्य संवर्धन पर मिलकर शोध करने की योजना है। इसी क्रम में केंद्र के वरीय वैज्ञानिक डॉ. आइएस सिंह ने बांडीपोरा-वन स्थित कृषि विज्ञान केंद्र का दौरा कर स्थानीय वैज्ञानिकों के साथ तकनीकी चर्चा की। वहीं, जम्मू-कश्मीर के कृषि विभाग के अनुरोध पर डॉ. मनोज कुमार के नेतृत्व में चार सदस्यीय विशेषज्ञ दल के नवंबर या दिसंबर में दौरा करने की योजना है। इस दौरान किसानों को मखाने की खेती, जल एवं मिट्टी की जरूरतों और फसल प्रबंधन की जानकारी देने के साथ कृषि अधिकारियों को भी इसकी संभावनाओं से अवगत कराया जाएगा।

स्वर्ण वैदेही किस्म पर रहेगी नजर
इस पहल में दरभंगा के राष्ट्रीय मखाना अनुसंधान केंद्र की विकसित स्वर्ण वैदेही किस्म भी अहम हो सकती है। यह मखाने की उन्नत किस्म है, जिसे स्थिर जल वाले क्षेत्रों और जलभराव वाली जमीन में खेती के लिए विकसित किया गया है। हालांकि, जम्मू-कश्मीर में इसकी सफलता का पता वैज्ञानिक परीक्षण और खेतों में प्रदर्शन के बाद ही चलेगा। इसके लिए वहां के तापमान, जलवायु, मिट्टी और पानी की स्थिति का आकलन करना जरूरी होगा। अगर मखाने की खेती वहां सफल रहती है, तो किसानों के लिए अतिरिक्त आय के अवसर बन सकते हैं। साथ ही, बिहार के मिथिला क्षेत्र में विकसित कृषि तकनीक को दूसरे राज्यों तक पहुंचाने की दिशा में भी यह महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है।