द फॉलोअप डेस्क
जमुई स्थित कर्णगढ़ गांव से एक ऐसा मामला सामने आया है जहां से केवल दो लोगों के विवाद के कारण गांव के एक भी व्यक्ति को सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिलता। जानकारी के मुताबिक, पिछले 25 सालों से जमीन की रसीदें नहीं कट रही हैं, जिससे ग्रामीण सरकारी योजनाओं से वंचित हैं। बताते चलें कि 2001 में एक जमीन विवाद के कारण कोर्ट ने पूरे गांव का रजिस्टर-2 अंचल कार्यालय से तलब कर लिया था और अब तक रजिस्टर-2 वापस नहीं आया है, जिससे 400 से अधिक रैयत दाखिल-खारिज और भूमि संबंधी सुधार नहीं करा पा रहे हैं। वहीं, अंचलाधिकारी ने कोर्ट से रजिस्टर-2 मंगाने का आश्वासन दिया है। चकाई का कर्णगढ़ गांव प्रखंड ही नहीं, शायद जमुई जिले और बिहार प्रदेश का इकलौता गांव है जहां के रैयत के पिछले 25 वर्षों से जमीन का रसीद नहीं कट रहा है। दरअसल, यह स्थिति दो लोगों के बीच की कानूनी लड़ाई के कारण हुई है।
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बताते चलें कि रसीद नहीं कटने तथा दाखिल-खारिज पर विराम लगे होने के कारण सरकारी योजनाओं से रैयत वंचित हैं। 2001 में हरदेव सिंह एवं निशिकांत झा के बीच 20 डिसमिल जमीन को लेकर चल रहा विवाद जमुई न्यायालय पहुंच गया। न्यायालय में केस नं. 33/5 दर्ज होने के बाद जमुई न्यायालय द्वारा गांव की जमीन का रजिस्टर-2 का संपूर्ण कागजात चकाई अंचल कार्यालय से तलब किया गया। 25 वर्ष बीतने को हैं, लेकिन आज तक किसी अंचलाधिकारी ने रजिस्टर-2 वापस लाने की जहमत नहीं उठाई। इन 20-25 वर्षों में हरदेव सिंह और निशिकांत झा की मौत भी हो गई। अब इस लड़ाई को फिलहाल हरदेव सिंह के वंशज प्रभाकर सिंह और निशिकांत झा के वंशज शशिकांत झा कोर्ट में लड़ रहे हैं। जानकारी के मुताबिक, अब तक इस विवाद का कोई फैसला भी न्यायालय से नहीं आ पाया है। इस कारण 2001 से ही कर्णगढ़ गांव के लोगों का ऑनलाइन रसीद नहीं कट रहा है, जिसका परिणाम हुआ कि रसीद नहीं कटने से यहां के 400 से अधिक रैयत को किसी भी प्रकार की सरकारी सुविधा नहीं मिल पा रही है।

इसके साथ-साथ रैयतों को लगान रसीद कटाने से लेकर भूमि से संबंधित त्रुटियां सुधार कराने तक भारी दिक्कतों का सामना 25 वर्षों से करना पड़ रहा है। वहीं, लालमोहन बरनवाल, मुन्नी देवी, रामजीवन सिंह, परमानंद बरनवाल, श्रीकांत सिंह सहित अन्य रैयतों का कहना है कि रजिस्टर-2 कोर्ट में जमा रहने के कारण उनका ऑनलाइन नहीं हो पाया। इस कारण विभागीय पोर्टल से ऑनलाइन रसीद नहीं कट रहा है। हालांकि, ग्रमीणों का कहना है कि ऑफलाइन रसीद 2001 में कटा था। उसमें खाता तो दर्ज है, लेकिन खेसरा दर्ज नहीं है, जिससे लोगों का जमीन का म्यूटेशन भी नहीं हो पा रहा है। यहां के रैयतों का कहना है कि हम लोग जमीन की खरीद-बिक्री तो कर रहे हैं, लेकिन रजिस्टर-2 अंचल कार्यालय में उपलब्ध नहीं रहने के कारण जमीन का म्यूटेशन भी नहीं हो पा रहा है, जिससे हम लोगों को भारी कठिनाई हो रही है।