बिहार में जमीन रिकॉर्ड को डिजिटल और पारदर्शी बनाने की महत्वाकांक्षी योजना अब सवालों के घेरे में है। तय समयसीमा नजदीक है, लेकिन जमीन पर हालात इससे काफी पीछे दिखाई दे रहे हैं। राज्यभर में सर्वे, म्यूटेशन और रिकॉर्ड अपडेट की प्रक्रिया धीमी हो गई है। इसका असर आम लोगों पर देखने को मिल रहा है, जो जमीन संबंधी काम निपटाने के लिए काफी परेशान हैं। सरकार ने जमीन विवाद खत्म करने और रिकॉर्ड को पारदर्शी बनाने के लिए भूमि सर्वे की शुरुआत की थी। लेकिन अब यह खुद देरी और विवादों में फंसती जा रही है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, राज्य में म्यूटेशन, सुधार और रिकॉर्ड अपडेट से जुड़े 4.6 करोड़ से ज्यादा आवेदन रुका हुए हैं। हर दिन नए आवेदनों की संख्या बढ़ती जा रहे हैं, लेकिन निपटाने की रफ्तार कछुए की चाल से भी धीमी है। अंचल कार्यालयों में म्यूटेशन के लिए आए आम लोग महीनों तक फाइलों के चक्कर काट रहे हैं। भ्रष्टाचार और लेटलतीफी के बीच यह योजना अपने मकसद से काफी दूर नजर आ रही है। इस धीमी रफ्तार के पीछे की सबसे बड़ी वजह है अधिकारियों की कमी है।
जो अधिकारी हैं , उन पर पहले से ही काम का दबाव है। ऊपर से सरकार ने भूमि सर्वे के साथ उन्हें महादलित विकास मिशन और भू-अभियान जैसी दूसरी योजनाओं की जिम्मेदारी भी उन्के के कंधों पर डाल दी है। कई जिलों में अधिकारी या तो छुट्टी पर हैं या अन्य कामों में व्यस्त हैं, जिससे फाइलें महीनों तक टेबल पर ही पड़ी रहती हैं। सरकार ने पर्याप्त स्टाफ और संसाधनों के बिना इस बड़ी योजना की समयसीमा तय की थी, इसलिए अब यह धीरे-धीरे सिस्टम फेलियर की तरफ बढ़ती जा रही है। इस सुस्ती का सबसे बड़ा असर गांवों में देखने को मिल रहा है। समय पर जमीन के कागजात और डिजिटल रिकॉर्ड न मिलने के कारण किसानों को बैंक लोन लेने और सरकारी योजनाओं का लाभ उठाने में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। रिकॉर्ड अपडेट न होने से ग्रामीण इलाकों में जमीन से जुड़े आपसी विवाद और झगड़े भी बढ़ रहे हैं। योजना शुरुआत बड़े लक्ष्य के साथ हुई, लेकिन संसाधनों की कमी ने इसे कमजोर कर दिया है। अगर जल्द सुधार नहीं किया गया , तो यह महत्वाकांक्षी योजना समय पर पूरी नहीं हो पाएगी और सरकार के लिए यह बड़ा झटका साबित हो सकती है। 